December 28, 2011

एक्स्पोज़्ड:प्रशांत एंड स्तुति

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भगवान कभी कभी बड़ा अन्याय करते हैं.पता ही नहीं चलता की किस गलती की सजा दे रहे हैं वो..अब देखिये न..इसे आप गलती ही कहियेगा न की भगवान ने जिंदगी में कुछ दो चार ऐसे लोगों से मिलाया जो हमेशा मेरे पीछे हाथ-पैर धो के पड़े रहते हैं..हमेशा मुझे सताते रहते है..कभी कभी तो बड़ा दिल करता है की ऐसे लोगों की किसी को सुपारी देकर इनका हाथ-पावं तुड़वा दिया जाए जिससे की कुछ अक्ल आये इन्हें.कुल मिलाकर देखूं तो ऐसे मेरे पांच दोस्त हैं जो हर एंगल से नालायक हैं.लेकिन जिन दो खास महानुभाव ने मुझे ये पोस्ट लिखने को मजबूर किया वो हैं...श्री श्री प्रशांत प्रियदर्शी जी और श्रीमती स्तुति पाण्डेय जी.

मैंने जिंदगी में अब तक जितनी बड़ी बड़ी गलतियाँ की हैं उनमे इन दोनों से दोस्ती करने की गलती भी शामिल है...लेकिन मुझे लगता है की इनसे दोस्ती करने में मेरी कुछ खास ज्यादा गलती नहीं थी..दोस्ती करने के वक्त ये बड़े मासूम और भोले से थे..तभी तो इनसे मैंने दोस्ती की..लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते गए, इन दोनों के मासूम चेहरे के पीछे छिपे शैतान के दर्शन भी होने लगे.कभी कभी तो मुझे ये शक होता है की शायद ये दोनों ने अपने शैतानी चेहरे को छिपा कर एक शरीफ चेहरे का मुखौटा लगा लिया था.

अब देखिये न, पुरानी एक बात है..पिछले साल अगस्त-सितम्बर की...मैंने स्तुति से बड़े अच्छे से जीटॉक पे कहा था की मेरे लिए कुछ गिफ्ट भेज दो, ओनलाईन ही खरीद कर भेज दो..कुछ भी लेकिन भेज दो(उसने मुझे बर्थडे पे कुछ गिफ्ट नहीं दिया था न)..मेरे ये कहने के कुछ दिन बाद पता है स्तुति मैडम ने मुझे क्या भेजा? देख लीजिए आप खुद ही--

स्तुति ने बड़े बेशर्मी से लिखा था--'देखिये..देखिये :P'

और तो और इसने मेरे साथ प्रशांत को भी ई-मेल कर दिया..प्रशांत तो अब बचपन से ही नालायक है..उसने तुरंत रिप्लाई भी कर दिया -- '"नामांकरण मैं कर देता हूँ "अभिषेकलिंगम" :)"
स्तुति मैडम प्रशांत के इस नामकरण से खुश भी बहुत हो गयीं..और गला फार के चिल्लाने लगी..'हाँ हाँ..बहुत सही..बहुत सही.."

मैं वैसे तो शरीफ हूँ लेकिन ऐसे दोस्तों(असल में दुश्मन) के लिए कभी कभी कुछ गलत शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ता है..मैंने गुस्से में जवाब दिया - "कच्चा चबा जाएंगे रे स्तुतिया तुमको...समझी... आयें का??बतावे???. प्रशान्त के साथ मत रहो रे.. तुम्हारा खोपड़ी बहुत डिटोरीअरेट कर गया है..जो बचा है, बचा लो :P"
इसके साथ साथ मैंने प्रशांत को भी चेता दिया था.."परसांत तुम जादा उछलो मत..समझे..तुमरा फोटो को तो एडिट हम करेंगे...और फिर उसका नामकरण करवा लेना स्तुति महरानी से"

अब मैंने तो अपने तरफ से दोनों को अच्छा सा जवाब दे दिया लेकिन स्तुति का नाटक इतने भर से ही तो खत्म नहीं होना था न..वो अजय भईया की चापलूसी करने लगी(उन्हें भी इसने ग्रुप मेल भेजा था).कहने लगी - "देख रहे हैं ना भईया ...कईसे कईसे  बोल रहा है ई मुह-झौंसा :-( डाँटीए  ना इसको :( [इसी से आप इसके टेढ़ी होने का सबूत पा सकते हैं]

लेकिन अजय भईया ठहरे शरीफ आदमी..अलग बात है की कुछ कुछ टॉपिक पर उनका सुई एक्के जगह अटका रह जाता है(और खास कर मेरे से सम्बंधित एक टॉपिक पर)..लेकिन वो ठहरे दिल के अच्छे तो उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया..तो परेसान बाबु(परसांत बाबु) ही उछल पड़े..कहने लगे --"बट्टा, मेरे फोटो को बीच में मत घसीटना.. नहीं तो हम ऐसा एडिट करेंगे कि कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगे.. :P" [ये परसांत का ओरिजनल रूप है जो बहुत लोगों से छिपा हुआ है]

स्तुति में कभी कभी..बहुत कम समय के लिए(क्षणिक कह सकते हैं), एक अच्छा इंसान देखने को मिलता है और यही वो समय होता है जब वो थोडा बहुत मेरे पक्ष में कुछ कहती भी है..प्रशांत के उस कमेन्ट के बाद स्तुति ने प्रशांत को जवाब दिया --"ई बात? रहो रहो...तुम्हारा फोटो तो खोज के किसी पे साटेंगे, अरे अभिषेक...सजेसन दो रे की काची पे साटें इसका फोटो :-X"

अब स्तुति मेरे साईड से बोली तो मेरा तो दिल भर आया(आंसू भी टपक पड़े एक दो)..तो मैंने भी अच्छा सा जवाब दिया उसे --रुको न रे..अभी तो ऑफिस में हैं...आज दिन भर सोचते हैं और फिर बताएँगे की किसपर साटो..वैसे तुम भी दिमाग चलाओ रे स्तुति...हम भी दिमाग दौड़ा रहे हैं...परसांतवा का तो बैंड बजा देंगे दुन्नु"

अब प्रशांत अपने असली रूप के चरम पर पहुँच चूका था...कहने लगा -"इस मामले में स्तुति को हम नहीं बोलेंगे कुच्छो.. लेकिन अभिषेक कुच्छो किया तो बर्बाद कर देंगे उसको.. :)"..मैंने जब पूछा की तुमको मेरे से क्या दुश्मनी है रे..स्तुति ही तो शुरू की है..तो एकदम झेलू टाईप का पथेटिक जवाब दिया उसने --"उसको लड़की होने का बेनिफिट मिल रहा है, जो तुमको नहीं मिलेगा.. :P"

इसके मासूम शकल पर मत जाईये..
स्तुति शायद इस जवाब से इतनी खुश हो गयी की उसने फिर आगे कुछ लिखा ही नहीं...प्रशांत को मैंने अच्छा ख़ासा सुनाया भी...लेकिन इसने भी कुछ जवाब नहीं दिया..शायद उसे एकाएक ये बात याद आ गयी हो की मैं जब भी चाहूँ जिस वक्त भी..उसके होश ठिकाने ला सकता हूँ...यहाँ मैं ये बता दूँ की कभी कभी वो मेरे से बेहद डरता भी है, ये उसने खुद कुबूल किया था एक दिन, तो मैंने उसे ये कह के सान्तवना दिया की घबराओ मत..तुम्हारे ऊपर हम कभी अपना गुस्सा नहीं निकालेंगे..एक तरह से ये एक वचन दिया था मैंने उसे...जो की लगता है अब तोडना पड़ेगा मुझे, क्यूंकि उसकी कुछ हरकते अब बद से बद्दतर होते जा रहीं हैं..

कभी कभी ये दोनों मिलकर आपस में सेटिंग कर लेते हैं और मेरे पे एकसाथ एटैक करते हैं...पिछले दो तीन दिनों से यही हो रहा है..फेसबुक पर पुराने बड़े शायरों की इतनी अच्छी शायरी और नज़्म मैं शेयर करता हूँ लेकिन ये दोनों वहाँ अपनी रंगत दिखाने पहुँच ही जाते हैं..और फिर शुरू होता है इन दोनों का अन-टोलरेबल बकवास..

परसों शाम में मैंने जिगर साहब की एक खूबसूरत शायरी लिखी थी अपने स्टेट्स में..इतनी अच्छी शायरी पे स्तुति ने एकदम जबरदस्त झेलू किस्म का कमेन्ट लिखा(जिसे अगर जिगर साहब ऊपर से देखें अगर तो आसमान से कूद कर खुदकुशी कर लें).स्तुति के उस बेतुके कमेन्ट के बाद शुरू हुआ प्रशांत के बकवास कमेंटों का सिलसिला....जो की पुरे तरह से मेरे पे केंद्रित था.ये बताना यहाँ जरूरी नहीं की कमेन्ट में क्या बातचीत हुई, क्यूंकि इन दोनों की तरह ही वो सारी बातें बेकार और फ़ालतू थी.

अंदर छिपा हुआ है एक शैतान इसमें 
ये दोनों तो पागल हैं जो ऐसे पागलपन के कमेन्ट करते रहते हैं ..लेकिन कुछ वैसे लोग जो थोडा समझदार हैं और हम लोगों से बड़े भी वो भी इन दोनों के बातों में कैसे आ जाते हैं, मुझे बेहद आश्चर्य होता है.मैं बात कर रहा हूँ शिवम भईया की..वैसे तो ये बहुत समझदार हैं लेकिन कभी कभी स्तुति और प्रशांत के चक्कर में आकार ये अपना दिमाग इस्तेमाल करना भूल जाते हैं और उनके साथ हो लेते हैं..ऐसे में मेरे एकमात्र रक्षक बचते हैं अजय भईया..लेकिन उनका तो सुई हमेशा एक्के टॉपिक पे अटकल रहता है(वैसे परसों उन्होंने वादा किया था की वो अब से मेरे साईड ही रहेंगे..है न भईया?)

ये तो बात थी परसों की..अभी कल ही मैंने एक स्टेट्स डाला और उसपर सीधा निशाना साधा प्रशांत ने..मुझे लगा की चलो इससे जल्दी ही निपट जायेंगे और भगा देंगे...लेकिन पीछे पीछे दौड़ते भागते स्तुति भी पहुँच गयी...ये गाना गाते.."तुमने पुकारा और हम चले आये..नमक हथेली पे ले आयें रे(मेरे ज़ख्मों पे लगाने के लिए)".इस बार तो शिखा दीदी ने भी उन दोनों का बढ़ चढ के साथ दिया...जिसकी मुझे बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी..वो जेनराली मेरे तरफ ही रहती हैं(एक्के दुक्के मजाक को छोड़कर), लेकिन कल पता नहीं उन्हें भी क्या हो गया था(मैं ये मान कर चल रहा हूँ की प्रशांत और स्तुति ने उन्हें कोई रिश्वत वैगरह दिया होगा)..

इन दोनों के इमोशनल अत्याचारों से तंग आकार मैं ये पोस्ट लिखने पर मजबूर हो गया हूँ.एक और कारण था, की प्रशांत भी ऐसे ही किसी पोस्ट की तय्यारी में लगा हुआ है..तो मुझे लगा की आप लोगों के सामने प्रशांत का गलत-सलत वर्जन आये, इससे पहले मैं ही सही सही बात और प्रशांत के असली चरित्र से आपको परिचित करवा दूँ..

दिल की भड़ास लेकिन इतना भर लिखने से ही खत्म नहीं हुई..बहुत संभावनाएं हैं की अगली पोस्ट में भी दोनों के मासूम-शरीफ चेहरे के पीछे छिपे शैतान को और अच्छे से सामने लाऊं, लेकिन अगर प्रशांत और स्तुति चाहें तो मुझसे बात कर के मामले को यहीं खत्म कर सकते हैं(On my terms and conditions) 
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December 27, 2011

ग़ालिब-गुलज़ार : गुलज़ार साहब के साथ कुछ लम्हे (७)

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हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, 
कहते हैं कि गालिब का है अंदाज ए बयां और
-गुलज़ार

कभी कभी कोई रात फिल्म देखकर गुज़रती है...तो कभी किताबों में...और कोई कोई रात ऐसी भी होती है जो गुलज़ार साहब के नज्मों के नाम रहती है.कल की मेरी रात वैसी ही थी..शाम के बोझिल मूड को हल्का किया मेरे दो नालायक दोस्तों(प्रशांत-स्तुति)ने, और रात में दिल खुश हुआ गुलज़ार साहब की नज्मों से...

आँख में तैरती हैं तसवीरें 
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए 
आईना देखता है जब मुझको 
एक मासूम सा सवाल लिए

कुछ महीने पहले मेरे इस फेसबुक स्टेट्स पर सलिल चचा ने बहुत ही सही कमेन्ट किया था.. - "क्या बात है! आजकल "गुलज़ार" नामक नशा तो नहीं शुरू कर दिया!! बड़ी खराब लत है.. छुटती नहीं है काफिर मुँह को लगी हुई"     ----मेरे लिए तो गुलज़ार-नामक नशा के तो कई दिन हो जाते हैं और कई कई दिनों तक ये हैंगओवर टिका ही रहता है..जैसे कल रात का हैंगओवर अभी तक उतरा नहीं, तो सोचा की इस नशे में थोडा आपको भी डुबो दिया जाए...

क्रिसमस और न्यू इअर का अभी माहौल है...तो ऐसे में एक खास नज़्म सुनिए जो एकदम इसी मौके पे फिट बैठता है...

रात क्रिसमस की थी..
न तेरे बस की थी..
न मेरे बस की थी..

चाँद पेड़ों पे था
और मैं गिरजे में थी
तुने लब छू लिए
जब मैं सजदे में थी
कैसे भूलूंगी मैं
वो घडी गश की थी
न तेरे बस की थी..
ना मेरे बस की थी..

तुम अकेले न थे
मैं भी तनहा ना थी
मुझमें सब खौफ थे
तुमको परवाह न थी.
तुम तो कमसिन न थे
मैं भी उन्नीस की थी
न तेरे बस की थी
न मेरे बस की थी

खूबसूरत थी वो
उम्र-ए-ज़ज्बात की
जिंदगी दे गयी
रात खैरात की
क्या गलत क्या सही
मर्जी जीसस की थी



गुलज़ार साहब के नज्मों के ही हैंगओवर में था ही की सुबह किसी के स्टेट्स से याद आया आज चचा ग़ालिब का भी जन्मदिन है...गुलज़ार साहब ने ग़ालिब चचा के ऊपर एक 'मिर्ज़ा ग़ालिब' सिरिअल भी बनाया था, जिसे दूरदर्शन पर प्रसारित किया जाता था.गुलज़ार साहब मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में कहते थे की--

''ग़ालिब फारसी के दबदबे के दौर में सहज उर्दू में शायरी करते थे.मिर्जा गालिब के अंदर अहम बहुत था और यह नकारात्मक नहीं बल्कि सकारात्मक था, क्योंकि उनके अंदर आत्माभिमान था.वह फारसी के दबदबे के दौर में सहज उर्दू में शायरी करने वाले व्यक्ति थे और वह धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति थे.गालिब की शायरी और बर्ताव में धर्मनिरपेक्ष भावना थी,उसी के चलते मैंने उन पर साढ़े छह घंटे लंबा टेलीविजन सीरियल बनाया ताकि लोग गालिब जैसे महान शायर से रूबरू हो सकें.उनकी हाजिर जवाबी के लोग कायल थे.आज हमें युवाओं को अपनी विशाल संस्कृति से परिचित कराना चाहिए. हमें शेक्सपीयर को पढ़ने से कोई फायदा नहीं हैं, लेकिन इसके साथ हमें हमारे शायरों और लेखकों से मिला दीजिए.कुछ ऐसा करिये कि शेक्सपीयर के साथ कालिदास, टैगोर और अन्य भाषाओं के लेखकों की कृतियां भी पाठयक्रम में आ जाएं.मेरा मानना है कि किसी भी मातृभाषा वाले व्यक्ति के लिए गालिब को जानना बेहद जरूरी है, क्योंकि वह भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है. नवजवान पीढ़ी केवल टेलीविजन और इंटरनेट तक सिमट गई है. अपनी संस्कृति को जानने के लिए यहां की गलियों में घूमें तो सब कुछ समझ में आ जाएगा.''
एक मजेदार किस्सा भी गुलज़ार साहब सुनाते हैं ग़ालिब चचा के बारे में --
"एक बार किसी दुकानदार ने उधार की गयी शराब के दाम वसूल न होने पर मुकदमा चला दिया.मुक़दमे की सुनवाई मुफ्ती सदरुद्दीन की अदालत में हुई.आरोप सुनाया गया.इनको उज्रदारी में क्या कहना था, शराब तो उधर मंगवाई ही थी सो कहते हैं क्या?आरोप सुनकर शेर पढ़ दिया -

कर्ज की पीते थे लेकिन समझते थे की
हाँ रंग लाएंगी हमारी फाकामस्ती इक दिन
मुफ्ती साहब ने अपने पास से वादी को पैसे दे दिए और मिर्जा को छोड़ दिया."

गुलज़ार साहब ने तो ग़ालिब का परिचय भी कुछ इस तरह ही दिया था --

बल्ली मारां की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे
गुङगुङाते हुई पान की वो दाद-वो, वाह-वा
दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा-से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमयाने की आवाज़ !
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अँधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोड़ के चलते हैं यहाँ
चूड़ीवालान के कटड़े की बड़ी बी जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अँधेरी-सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चिराग़ों की शुरू होती है
एक क़ुरआने सुख़न का सफ़्हाखुलता है 
असद उल्लाह ख़ाँ `ग़ालिब' का पता मिलता है




मिर्जा ग़ालिब से जुड़े किस्से भी बड़े दिलचस्प मुझे लगते हैं..शायद इसलिए भी मिर्ज़ा ग़ालिब धारावाहिक मुझे बहुत पसंद है, और पुरे एपिसोड मेरे पास मौजूद हैं, जिसे मैं कई दफे देख चूका हूँ..मिर्ज़ा ग़ालिब से जुड़ा एक मजेदार किस्सा है -

"जाड़े का मौसम था.तोते का पिंजरा सामने रखा था और सर्द हवा चल रही थी.तोता सर्दी के कारण परों में मुँह छिपाए बैठा हुआ था.मिर्ज़ा ने देखा और उनकी अन्दर की जलन बाहर निकली...बोले- "मियाँ मिट्ठू! न तुम्हारे जोरू, न बच्चे...तुम किस फ़िक्र में यों सर झुकाए बैठे हो?"

एक और किस्सा है ग़ालिब का.ग़दर के दिनों में अँगरेज़ सभी मुसलमानों को शक की निगाह से देखते थे.दिल्ली मुसलामानों से खाली हो गयी थी, पर ग़ालिब और कुछ दूसरे लोग चुपचाप अपने घरों में पड़े रहे.एक दिन कुछ गगोरे इन्हें भी पकड़कर कर्नल के पास ले गए.उस वक्त कुलाह(ऊँची टोपी) इनके सर पर थी.अजीब वेशभूषा थी.कर्नल ने मिर्जा की ऐसी वेशभूषा देखि तो पूछा -टूम मुसमान है?मिर्जा ने कहा- 'आधा'.कर्नल ने पूछा -इसका क्या मटलब है? तो इसपर मिर्जा बोलें - शराब पीता हूँ, सूअर नहीं खाता. कर्नल सुनकर हसने लगे और इन्हें घर जाने की इजाजत दे दी.

सुशिल भैया ने भी अपने एक पोस्ट में मिर्जा ग़ालिब का ही जिक्र किया था..उन्होंने एक किताब के बारे में बतलाया था जिसे श्री चरणदास सिंधु जी ने लिखा है.वो मिर्जा ग़ालिब से जुडी कुछ कहानी और सुनाते हैं -

यूं तो मिर्जा गालिब और बदकिस्मती दोनों साथ-साथ चलते हैं, किंतु इस नाटक में गालिब के उस एक रुप को जब जाना तो मैं उनके हौंसले का कायल हुए बगैर नहीं रह सका, जब पूरी पेंशन न मिलने के कारण उन्हें मुफलिसी में गुजर-बसर करना पड़ी। जिंदगी के सुनहरे दिनों में वो सिर तक कर्ज में डूबे रहे। रोज-ब-रोज दरवाजे पर कर्जख्वाहों के तकाजे मिर्जा गालिब की बेगम उमराओं जान को परेशान करते रहे। एक वक्त ऐसा भी आया जब मिर्जा गालिब के खिलाफ डिक्रियां निकलने लगी। जिसकी वजह से मिर्जा गालिब का गृहस्थ जीवन तनावों से घिरता रहा। मगर क्या मजाल कि इस फनकार को अपने फन से कोई तकलीफ जुदा कर पाती। यहां तक कि तनावो के बीच मिर्जा गालिब अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को फौत होते देखता रहा और अंदर ही अंदर रोता रहा। शायद तभी उनकी कलम से यह शेर निकला :


मेरी किसमत में गम अगर इतना था
दिल भी, या रब्ब , कई दिये होते


मानसिक उलझनों, शारीरिक कष्टों और आर्थिक चिंताओं के कारण जीवन के अन्तिम वर्षों में ग़ालिब प्रायः मृत्यु की आकांक्षा किया करते थे.हर साल अपनी मृत्यु तिथि निकालते.पर विनोद वृत्ति अंत तक बनी रही.एक बार जब मृत्यु तिथि का ज़िक्र एक शिष्य से किया तो उसने कहा "इंशा अल्लाह, यह तारीख भी ग़लत साबित होगी.." इस पर मिर्ज़ा बोले, "देखो साहब!तुम ऐसी फ़ाल मुँह से न निकालो..अगर यह तारीख ग़लत साबित हुई तो मैं सिर फोड़कर मर जाउँगा"  


एक बार दिल्ली में महामारी फैली..मीर मेहदीहसन 'मजरुह' ने अपने ख़त में ज़िक्र किया तो उसके जवाब में लिखते हैं, "भई, कैसी वबा?जब एक सत्तर बरस के बुड्ढे और सत्तर बरस की बुढ़िया को न मार सकी"  


अन्तिम दिनों में ग़ालिब अक्सर अपना यह मिसरा पढ़ा करते थे :  
ऐ मर्गे-नागहाँ ! तुझे क्या इंतज़ार है ?  
और बार बार दोहराते :  


दमे-वापसी बर सरे-राह है, 
अज़ीज़ो!अब अल्ला ही अल्लाह है.


(मिर्ज़ा ग़ालिब से जुड़ी कहानियां कुछ मैंने बहुत पहले कहीं से अपने ब्लॉग के ड्राफ्ट में सेव किया था,फ़िलहाल याद नहीं वो लिंक्स, तो बता नहीं सकता कहाँ से वो कहानियां मैंने ली थी)




चलते चलते, गुलज़ार साहब की वो दो नज्में, जिसके हैंगओवर में कल रात था ---





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December 22, 2011

इंजीनियरिंग के वे दिन (७)

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आजकल बड़े अजीब अजीब से सपने देख रहा हूँ.सबसे मजे की बात ये है की इन दिनों वही सपने आ रहे हैं जिनके पूरा होने की कहीं कोई भी गुंजाइश अब नहीं है, हाँ लेकिन कभी मैंने और मेरे दोस्त ने वे सपने देखे थे.कल रात के सपने में एक बड़ी पुरानी तस्वीर दिखाई दी..इंजीनियरिंग फर्स्ट इअर का वो हॉस्टल जिसे पता नहीं क्यों कॉलेज वालों ने 'व्हाईट हाउस' का नाम दे रखा था..हॉस्टल के सबसे पीछे वाले कमरे से लगा हॉस्टल का बाउंड्री, और दो दोस्त उस बाउंड्री पे बैठे हुए...पास के कमरे में एक छोटा सा टू-ईन-वन रखा हुआ है जिसमे 'तुम बिन' फिल्म के गाने एकदम धीमे आवाज़ में बज रहे हैं..और उन दो दोस्तों के साथ वो दो लड़कियां बैठी हुई हैं जिनके बारे में वो दो दोस्त पूरी पूरी रात बात करते रहते थे.

इंजीनियरिंग फर्स्ट इअर के हॉस्टल का वो बाउंड्री हम दो दोस्तों के लिए उन दिनों सबसे अच्छी जगह थी, जहाँ हम एक दूसरे से अपनी हर बात शेयर करते थे और दोनों दोस्त मिलकर किसी एक नतीजे पे पहुँचते थे...दोनों मिलकर मुश्किलों का हल निकालते थे.हमारी महफ़िल वहाँ तब लगती थी जब पुरे हॉस्टल के लड़के सो चुके होते थे, क्यूंकि हमें अपनी बातों में किसी भी किस्म की दखलअंदाजी पसंद नहीं थी.जब भी हॉस्टल का कोई लड़का सामने आ जाता तो हम एकदम से अपनी बातों का रुख पलट देते थे(कुछ ही समय में हम इस कला में एक्सपर्ट हो गए थे :P)..एक छोटा सा टू-इन-वन, जो उन दिनों मेरा अभिन्न मित्र था और जिसे मैंने पटना से चलते वक्त बैग में रख लिया था...उसमे गाने भी रात भर चलते रहते थे.हम घंटों बातें करते थे,कभी कभी तो पता भी नहीं चलता था की कब सुबह हो गयी और हम सोचते थे की रात भी कितनी छोटी होती है, तुरंत सुबह हो जाती है...

अपनी इस आदत की शुरुआत कैसी हुई ये भी एकदम अच्छे से याद है..हमें हॉस्टल में आये अभी दो चार दिन ही हुए थे और पापा मुझे हॉस्टल में छोड़कर एक दिन पहले ही पटना लौटे थे..हमारा रूम अव्यस्थित था..सारा सामान पैक्ड था..मैंने अकरम को उस शाम बताया था की मैं अपने साथ टू-इन-वन भी लेते आया हूँ..वो तब से ही मेरे पीछे लग गया था की जल्दी टू-इन-वन बाहर निकालो बैग से..एक दिन पहले तक वो मुझे 'आप' कह के बुलाता था और उस शाम वो सीधा 'आप' से 'तुम' और फिर 'तू' पे उतर आया..'तू निकालता है की नहीं टू-ईन-वन जल्दी से', 'कब निकालेगा बे टू-ईन-वन'....रात को खाने के बाद जब हम अपने रूम आये तो मैंने सबसे पहले बैग से टू-ईन-वन निकाल के अकरम को दे दिया....टू-ईन-वन के साथ ही साथ मेरे बैग में बहुत से बेशकीमती सामान भी थे जिसे मैंने बैग से निकाल के टेबल पर रख दिया था....मेरा रूममेट अकरम थोडा अशिष्ट है, तो वो तुरत मेरे सारे सामानों को उलट-पुलट कर देखने लगा...उसी में उसे एक फोटो-एल्बम दिखाई दिया...वो उस फोटो एल्बम को देखने लगा...एक तस्वीर पर मैंने कुछ लिख रखा था..अकरम ने उसे पढ़ा और फिर वो मेरे पीछे पड़ गया..मैं चाहता तो उसके उस सवाल को टाल सकता था, लेकिन पता नहीं क्यों उसे मैंने उस फोटो के पीछे की पूरी कहानी बता दी..और फिर अकरम एकदम 'मोहब्बतें' स्टाईल में कहता है की 'यार तू तो इस लड़की से बहुत प्यार करता है रे.. ':P  इसपर मैंने भी उसे मोहब्बतें वाला ही करारा जवाब दिया...'अरे नहीं यार..ऐसा कुछ नहीं है..वो सिर्फ मेरी पुरानी अच्छी दोस्त है..' :P  (उस वक्त वहाँ कोई तीसरा दोस्त मौजूद नहीं था जो ये डायलोग मारता की 'ओए चुप..सिर्फ एक पुरानी दोस्त..एक बात बता और कितने पुरानी दोस्तों की तस्वीर बैग में लिए घूमता है तू :D )

उस रात हम बहुत देर तक बात करते रहे..करीब तीन बजे के आसपास अकरम को ये ख्याल आया की कल कॉलेज भी जाना है, लेकिन हम बातों में इतनी दूर निकल आये थे की सुबह कॉलेज जाने की बात बड़ी 'स्टूपिड' सी लगी हमें..रूम में सारा सामान बिखरा हुआ था और हम बातों के चक्कर में उसे समेटना भी भूल गए थे..शायद ये भी एक वजह थी की हम रूम से बाहर निकल आये थे और बाउंड्री पे बैठ कर गप्पे मार रहे थे..उसी दिन से व्हाईट-हाउस की वो बाउंड्री हम दोनों दोस्तों का अड्डा बन गया था जहाँ हम रात भर गप्पे मारते रहते थे..

हमारे दोस्त समित बाबु को हमारे इस अड्डे की भनक लग गयी..वो इस ताक में थे की हमें अपने अड्डे पे पकड़ सके और हमारी बातों को सुन सके..उन्हें हमारे इस अड्डे की भनक भी बड़े नाटकीय तरीके से लगी..हम दोनों दोस्त अपनी बातों में खोये हुए थे..तभी समित बाबु अपने चिर-परिचित अंदाज में रात में नींद से जगे और हमारे पीछे आकार खड़े हो गए, बिना कुछ बोले..और हमारी बातों के कुछ टुकड़े भी उनके कानों तक पहुँच गए...जैसे ही हमने समित को देखा, हमलोगों ने अपने बातों का रुख दूसरे तरफ मोड़ दिया..हालांकि इस कला में हम एक्सपर्ट थे लेकिन फिर भी समित बाबु के कानों तक बहुत सी बातें पहुँच चुकी थी...सुबह समित बाबु ने कॉलेज में मुझसे पूछा..'अबे तुम दुन्नु रात में का बात कर रहा था रे'..मैंने कहा : 'अरे कुछ नहीं..वो ऐसे ही घर परिवार का गप सब था..'..समित बाबु कहने लगे..'हमको बेवकूफ समझता है..घर परिवार का गप नहीं था..लड़की सब का  गप था..हम सब जानते हैं..तुम लोग अकेले अकेले बहुत कुछ सीक्रेट बतियाते रहता है...

अगले दिन रात में हम दोनों दोस्त फिर वहाँ बैठे, इस बात से अनजान की हमारे हर हरकत पर समित बाबु की निगाहें लगी हुई हैं.उन दिनों मैं खूब चिट्ठी लिखा करता था और मुझे भी मेरे दोस्त खूब चिट्ठियां लिखा करते थे..हमारी चिट्ठियां कॉलेज के पते पर आती थी, और उन दिनों मैं कॉलेज जाने में ज्यादा विश्वास रखता नहीं था, तो अकरम मेरी चिट्ठियां लेते आया करता था.उस दिन भी अकरम ने मेरी एक चिट्ठी लाकर मुझे दी..जो बहुत दूर से एक खास दोस्त ने मुझे भेजी थी..रात में जब मैं और अकरम अपने अड्डे पे बैठे हुए थे, तब मैं उस चिट्ठी के कुछ अंश अकरम को पढ़ के सुना रहा था...इतने में हमारे समित बाबु अचानक से प्रकट हो गए और मेरे हाथ से चिट्ठी छिनने लगे...बड़ी मुश्किल से मैंने उस चिट्ठी को समित के हाथों से बचा कर अपने जेब में रख लिया...लेकिन फिर भी समित बाबु बहुत सी बातें जान गए थे और मुझे उसे भी उस चिट्ठी के बारे में बताना पड़ा.. उस दिन से समित उस अड्डे पर हम दोनों दोस्त को कंपनी देने लगा(हालांकि हम और अकरम अक्सर रात को वहाँ बैठ के गप्पे करते थे और समित कभी कभी).समित के बारे में हमारी राय पहले कुछ खास अच्छी नहीं थी लेकिन शायद इसी बाउंड्री पर समित के साथ बिताए समय ने समित के बारे में हमारी राय बिलकुल बदल कर रख दी, और हम तीनो इतने अच्छे और करीबी दोस्त बने... :)

(एक पुरानी तस्वीर..2008 में बैंगलोर में ली गयी एक तस्वीर..) 
- फ्रेंड्स फॉर लाइफ -
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December 19, 2011

खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं

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"अजल से वे डरें जीने को जो अच्छा समझते हैं
मियाँ! हम चार दिन की जिन्दगी को क्या समझते हैं?"
- पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल


जिन्दगी वादे-फना तुझको मिलेगी 'हसरत'
तेरा जीना तेरे मरने की बदौलत होगा
 - अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान


"गुलो-नसरीनो-सम्बुल की जगह अब खाक उडती है,
उजाडा हाय! किस कम्बख्त ने यह बोस्ताँ मेरा?"
- पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल


"वो रंग अब कहाँ है नसरीनो-नसतरन में,
उजडा हुआ पडा है क्या खाक है वतन में?"
 - अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान


हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,
हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर ,
वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर,
गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर ,
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !

अपनी किस्मत में अजल ही से सितम रक्खा था,
रंज रक्खा था मेहन रक्खी थी गम रक्खा था ,
किसको परवाह थी और किसमें ये दम रक्खा था,
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था ,
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को !

अपना कुछ गम नहीं लेकिन ए ख़याल आता है,
मादरे-हिन्द पे कब तक ये जवाल आता है ,
कौमी-आज़ादी का कब हिन्द पे साल आता है,
कौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है ,
मुन्तजिर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को  !

नौजवानों! जो तबीयत में तुम्हारी खटके,
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ,
आपके अज्वे-वदन होवें जुदा कट-कट के,
और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके ,
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को !

एक परवाने का बहता है लहू नस-नस में,
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ,
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में,
भाई खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में ,
बहने तैयार चिताओं से लिपट जाने को !

सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं ,
खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं ,
जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !

नौजवानो ! यही मौका है उठो खुल खेलो,
खिदमते-कौम में जो आये वला सब झेलो ,
देश के वास्ते सब अपनी जबानी दे दो ,
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएँ ले लो ,
देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को ?
- पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल


"जाऊँगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा,
जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा?
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं "फिर आऊँगा,फिर आऊँगा,
फिर आकर के ऐ भारत माँ तुझको आज़ाद कराऊँगा".

जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ..
हाँ खुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगा,
और जन्नत के बदले उससे इक पुनर्जन्म ही माँगूंगा.."
- अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान

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December 15, 2011

प्रिय राम(निर्मल वर्मा के पत्र) : २

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(इन खतों को जिस दिन मैंने पढ़ा था, उसके बाद इसमें से कुछ न कुछ ड्राफ्ट में सेव करता गया.पोस्ट काफी बड़ी और क्लटरड हो गयी थी.इस वजह से काफी दिन पोस्ट करने का दिल नहीं किया..कल रात कोशिश की थी की वो क्लटरनेस थोड़ी कम हो और पोस्ट थोड़ी छोटी हो, लेकिन फिर भी पोस्ट कोशिशों के बावजूद लंबी ही रही और अनॉर्गनाइज़्ड भी...लेकिन फिर भी उनके लिखे 68 खतों से कुछ अंश निकाल निकाल कर यहाँ एक साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ...निर्मल वर्मा के चाहने वालों के लिए पोस्ट की लम्बाई मेरे ख्याल से कोई मायने नहीं रखेगी...उतने खतों में से जो थोडा बहुत यहाँ मैंने डाला है, उसमे गलतियाँ हो सकती हैं, कृपया इग्नोर करें!)

प्रिय राम

लंबे अरसे के बाद तुम्हारा पत्र मिला.इस समय तक तुम दिल्ली लौट आये होगे.हार्वन में तुमने काफी शान्ति और ख़ामोशी में अपनी छुट्टियाँ बितायी होगी.मैं वहाँ कभी नहीं गया किन्तु तुम्हारे पत्र से उसके सौंदर्य कि कल्पना कर सकता हूँ.मैंने गिन कर हिसाब लगाया कि लगभग 20 वर्ष पहले मैं काश्मीर गया था.उसकी स्मृति अब भी बहुत साफ़ है.क्या तुम मानसबल या वुलर भी गए थे?तुमने काश्मीर में अन्तिम सप्ताह पहलगावं में बिताया, यह जानकार खुशी हुई.दिल्ली लौटने पर तुम्हे सचमुच काफी भयानक सा लगता होगा-बेहतर होता अगर तुम सितम्बर तक वहाँ रुके रहते.यों भी काश्मीर का पतझड़ अपने में अद्दुतीय सुख है-जिसकी मैं सिर्फ कल्पना कर सकता हूँ.तुम तो वहाँ रह चुके हो.

मैं तुम्हे क्लाद्नो से लिख रहा हूँ, जहाँ बकुल का अस्पताल है.वह और पुतुल(बेटी) एक ही कमरे में रहते हैं.अस्पताल के पीछे रेलवे लाईन है जहाँ से प्राग कि दिशा में रेलें जाती हैं.रात को पुतुल के सोने के बाद मैं अक्सर टेरेस पर बैठा रहता हूँ.दूर दूर तक जुलाई का तारों भरा आकाश और शहर कि रोशनियाँ टिमटिमाती दिखाई देती हैं.प्राग में आजकल मेट्रो बनाने के लिए सड़कें खोदी जा रही हैं, सब कुछ उल्टा पुल्टा जा रहा है, आजकल यहाँ का सबसे प्रिय मजाक यह है कि किसी ने एक अँगरेज़ टूरिस्ट से पूछा कि उसे प्राग कैसा लगा-उत्तर में उसने कहा, It is a nice cite, but I wish I should have come here before the earthquake! यों भी गर्मियों में मुझे प्राग एकदम पराया शहर जान पड़ता है-टूरिस्टों से भरा हुआ-इसलिए हफ्ते में एक दो बार यहाँ आकार बहुत अच्छा लगता है.हम संभवतः नवंबर तक यहीं रहेंगे.

यहाँ कुछ दिन पहले हमने मार्सेल मार्चो के pantomine का एक प्रदर्शन देखा, जो बहुत पसंद आया था.रुसी फिल्म War & Peace के पहले दो भाग भी देखे.फिल्म काफी रियलिस्टिक है और बहुत बड़े पैमाने पर बनायीं गयी है.अंतोनियोनी लो दिलम 'रेड डेजर्ट' भी यहाँ दिखाई जा रही है.कभी कभी यहाँ रात को माला-स्त्रना के बागों में चेंबर म्यूजिक के कंसर्ट होते हैं.पिछले सप्ताह मैं एक ऐसे ही कंसर्ट में गया था-ऊपर खुला आकाश, कुछ थोड़े से लोग और बीथोवेन या मोत्सार्ट का संगीत.ऐसी घड़ियाँ में सब थकन और उब मिट जाती है.इन दिनों खाली समय में मुझे बहुत दिलचस्प पुस्तकें पढ़ने को मिलीं.यहाँ हाल में अंग्रेजी पुस्तकों कि एक नयी लाइब्ररी खुली है, जो मेरे मनोरंजन का नया साधन है.अगर तुम्हे स्टीफन स्पेंडर कि आत्मकथा 'वर्ल्ड विदिन वर्ल्ड' पढ़ने को मिले तो अवश्य पढ़ना.पिछले दिनों शायद ही किसी पुस्तक ने अपनी इमानदारी और संवेदनशीलता के कारण मुझे इतना उद्द्वेलित किया हो.उसे पढते हुए आदमी खुद अपने जीवन कि उलझनों,कुंठाओं और तनावों को ज्यादा सफाई और तटस्थता से समझने कि कोशिश करने लगता है.किन्तु जिस चीज़ ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वह लेखक कि humbleness  या capacity to bear humilaitions है.यों एक कवि का गद्ध भी इतना पवित्र और प्रवाहपूर्ण हो सकता है, यह मेरे लिए अद्दुतीय अनुभव था.उसके अलावा नीरद चौधरी कि भी अन्तिम दो पुस्तकें पढ़ी-मैं धीरे धीरे उनका 'भक्त' होता जा रहा हूँ.शायद हिंदुओं का इतना खरा और सही विवेचन तुम्हे कहीं और नहीं मिलेगा.

प्राग में इन दिनों हर दूसरे तीसरे दिन बर्फ गिरती है.मैंने प्राग में इतनी बर्फ पहले कभी नहीं देखी.कभी कभी रात के समय टहलते हुए बर्फ में ढँका प्राग बहुत विचित्र सा जान पड़ता है.हालांकि बीच बीच में धुपिले दिन आ जाते हैं जो ज्यादा टिकते नहीं.मैं अक्सर सुबह काम करने के लिए नदी के सामने वाली कॉफी हाउस मेंचाला जाता हूँ.कासल के पास कि पहाड़ी और पेड़ों कि कतार एक सफ़ेद ख़ामोशी में ढँकी रहती है.

दस दिन पहले बकुल लन्दन चली गयी.ज्यों ही बकुल के लन्दन में रहने और काम करने की उम्मीद नज़र आएगी,मैं पुतुल को लेकर लन्दन चला जाऊँगा.फ़िलहाल मुझे प्राग का कमरा सहसा बहुत सुना-सा जान पड़ता है.यों इस सूनेपन को यहाँ की राजनितिक हलचलों ने बहुत हद तक दूर कर दिया है.कल दोपहर चेक प्रेसिडेंट नोवोत्नी को पब्लिक ओपिनियन के सामने झुक कर त्यागपत्र देने के लिए बाध्य होना पड़ा.समूचे सामजिक-सांस्कृतिक वातावरण में एक ऐसी ताजगी दिखाई देती है जो नए डेमोक्रेटिक परिवर्तनों की उपज है.सुबह सुबह अखबारों हाथों-हाथ बिक जाते हैं.रेडियो,टेलीविजन में रोज खुले तौर से पुरानी व्यवस्था की कड़ी आलोचना की जाती है.पूर्वी यूरोप में यह बिलकुल एक नए किस्म की क्रान्ति है, जहाँ एक रात में सारा सेंसर खत्म हो गया है.इस शांतिपूर्ण क्रान्ति का ड्रामा देखने के लिए आजकल प्राग में पश्चिमी और अमेरिका के सैंकडों पत्रकार जमा हैं.कहा जाता है, चीन के रेड गार्ड्स के आंदोलन के बाद ऊपर से नीचे तक हिला देने वालों का इतना बड़ा आंदोलन कहीं नहीं हुआ.

(लन्दन से लिखे पत्रों में से)

यहाँ आजकल कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा है.बाहर निकलते ही दुबारा घर लौटने की इच्छा होती है,.मैंने अरसे से यहाँ धुप नहीं देखी-न बर्फ गिरती है.सिर्फ धुन्ध और पीला मेघाच्छन्न आकाश.किन्तु बीच शाहद में क्रिसमस की रोशनियाँ और दुकानों की रंगारंग सजावट कहीं कहीं जोड़ नहीं.इस धूमधाम और चकाचौंध की प्राग की शांत भीड़ों और खाली दुकानों से कोई तुलना नहीं.मैं वैसे बहुत कम बाहर निकलता हूँ.मुझे अपने आसपास के शांत इलाकों में ही घूमना अच्छा लगता है.प्राग छोड़ने के बाद यहाँ मैं काफी अकेला पड़ गया हूँ.लेकिन अब मुझे यह अकेलापन उतना ही अच्छा लगता है जितनी प्राग की हलचल.मेरे पास काफी समय रहता है और मैं बहुत सी चीज़ों के बारे में सोच सकता हूँ और मुझे रोजमर्रा की राजनीति ज्यादा परेसान बेचैन नहीं करतीं.

भारत लौटने में कई दुविधाएं हैं.मेरे टिकट की समस्या अभी तक हल नहीं हुई,.अगर मेरी टिकट की समस्या हल हो गयी तो मैं अक्टूबर के शुरू में ही प्राग से होता हुआ भारत लौट आऊंगा.क्या तुम सोचते हो की वापिस आने पर मुझे किसी तरह का काम मिल सकेगा?इतने लंबे अरसे के बाद मैं अपने को अपने ही देश में काफी अजनबी सा पाऊंगा,यह चीज़ मुझे काफी असंगत और हास्यास्पद सी लगती हैं.किन्तु इसका सामना कभी न कभी करना ही होगा.

फिल्म निर्देशक को मैंने पत्र लिख दिया है.मैंने उन्हें तुमसे मिलने के लिए लिखा था.क्या कहानी के लिए 5000 रुपये पारिश्रमिक बहुत अधिक नहीं होगा?फिर भी जैसा तुम ठीक समझो,उनके साथ बातचीत करके तय कर लेना.यहाँ अंग्रेजी प्रकाशक से बातचीत ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी.मैंने फ़िलहाल उन्हें 'वे दिन' का पहला परिच्छेद दिया है, जो बहुत पहले वैद ने अनुवादित किया था.उन्होंने अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है.

पिछले दिनों मेरी स्थति में काफी सुधार हो गया है.बुखार अब नहीं आता और कमजोरी लगभग खत्म हो गयी है(फेफरों की कमजोरी के प्रथम संकेत).शायद अगले सप्ताह मुझे निश्चित रूप से कुछ पता चल सकेगा की मुझे अस्पताल में कितना अरसा रहना पड़ेगा.एक्सरे की नयी फिल्म के आधार पर हीं डॉक्टर किसी निर्णय पर पहुँच सकेंगे.यों पहले से तो मैं बहुत बेहतर महसूस करता हूँ-किन्तु हर नया दिन पुराने दिनों को दुहराता सा जान पड़ता हा.आदमी धीरे धीरे उब का भी आदी हो जाता है.

यह जानकार खुशी हुई की परिंदे के कॉपीराईट के बारे में मि.पुरोहित तुमसे बातचीत पक्की कर गए,इस आशय का उन्होंने मुझे पत्र भेजा था.मैंने उन्हें लिख दिया है की तुम मेरी ओर से कोंट्रेक्ट पर हस्ताक्षर कर दोगे.मैं समझता हूँ की 5000 रुपये बहुत अच्छा पारिश्रमिक है.मेरी आशा से बहुत अधिक.जहाँ तक फिल्म के सिनेरियो के तैयार करने का प्रश्न है-मैं उस बारे में ज्यादा आशावादी नहीं हूँ.पहले तो अभी भारत लौटने की समस्या काफी उलझी हुई है-अस्पताल से कब रिहाई होगी, इस बारे में कुछ पक्का नहीं है.टिकट की समस्या अलग है.क्या उन्होंने तुम्हे बताया की फिल्म के लिए उन्होंने किन अभिनेताओं को चुनने का इरादा किया है-मिस्टर पुरोहित स्वयं कैसे व्यक्ति हैं-फिल्मों की समझ-बुझ कैसी है?

क्या तुमने बैलो की किताब Herzog पढ़ी है?यदि नहीं तो अवश्य पढ़ना.मुझे वह बहुत ही प्रभावपूर्ण लगी -या शायद जिस मनः स्थति में मैं हूँ उसमे उस किताब का असर सचमुच बहुत गहरा था किन्तु तुम्हे भी बहुत पसंद आएगी.इधर मैंने रसेल की आत्मकथा पढ़ी.बहुत ही साहसपूर्ण लेखन है और एक जिद और पैसन के साथ सत्य के लिए लड़ने की कोशिश.किन्तु जो चीज़ मुझे सबसे अधिक प्रभावित करने वाली लगी, वह है एक निर्मल और शाश्वत को छूने वाली  तटस्थता-कुछ वैसा ही जैसे War and Peace में आंद्रे युद्ध के मैदान में नीले आकाश को देख कर आसपास की मारकाट ,चीख-पुकारें, यहाँ तक की अपने घावों को भी भूल जाता है.

(एक अंग्रेजी में लिखा पत्र)

20.1.1968
If I get settled here in London and earn enough to go to see the theaters,exhibition etc, i would love to write a sort of Londn letter for the Times of India.But under the present circumstances, living on the margin as it were it dosent seem very promising.Writing these days comes hard to me.My mind most of the time is a little distracted for the things which lead to nothing or occupied.in things which demand immediate and radical solution and which most of the time I am shrinking to face.And yet-strange as it may sound my faith in ultimate validity of literature,(as a source of personal salvation) has been very much strengthened.May be it due to my personal disillusionment of Czech events.All along it has been a rather dismal year-and yet it had its own flashes of brightness without which my life would have been much poorer.

(1970 में निर्मल स्वदेश लौट आये.शुरू में यहाँ की परिस्थिति में अपनी गृहस्थी ज़माने की पड़ताल करने.समय के साथ साथ स्पष्ट होता गया है की उनके बौद्धिक जुड़ाव उन्हें भारत में बसने के लिए खींच रहे हैं.पहला विवाह टूटने का एक प्रमुख कारण यह था.
रामकुमार 1970 में बतौर रॉकफेलर फैलो सपरिवार अमेरिका प्रवास में थे.)




(भारत लौटने पर लिखे पत्रों के अंश)


मेरी कहानी माया दर्पण पर काम शुरू हो गया है.उसके निर्देशक कुमार साहनी हैं, जो दो साल पहले पेरिस में ब्रेसा के अधीन काम करके लौटे हैं.दूसरे लोगों से उनकी प्रतिभा के बारे में काफी सुनने को मिला.हाल में माया दर्पण के बारे में धर्मयुग में एक लेख भी निकला है, जिसमे शाहनी ने अपने प्रयोगों की चर्चा की है.क्या तुम् न्यू योर्क में कोई नयी भारतीय फिल्म देख  पाते हो?

तुम्हे ये जानकार गहरा दुःख होगा की बड़ी भाभीजी अब हमारे बीच नहीं रहीं, तीन दिन पहले शाम के समय उन्होंने आखिरी सांस ली.इन पंक्तियों को लिखते हुए भी इनपर विश्वास नहीं होता की यह सच है.सान्तवना केवल इस बात की है की उन्होंने बहुत शान्ति से अन्तिम घड़ी को झेला.पता नहीं क्यों, उनके शांतिपूर्ण अंत को देख कर स्वयं मृत्यु की भयावहता बहुत कम जान पड़ती थी.जैसे वह बहुत धीरज और संकल्प से एक सीढ़ी उतर कर दूसरी सीढ़ी पर चली गयी हों.

तुम्हे शायद अब विश्वास नहीं होगा की हम सब लोग अपनी दैनिक-दुनिया के धंधों में लौट आये हैं.केवल कभी कभी-सहसा खाली क्षणों में-एक झटके की तरह बड़ी भाभीजी का चेहरा सामने आ जाता है-और वह भी बहुत पुराना चेहरा, जब वह बीमार नहीं पड़ी थीं-और यह चीज़ सबसे अधिक आश्चर्यजनक लगती है की वह चेहरा अब चिरकाल तक देखने को नहीं मिलेगा-Can we do nothing about death? and for a long time the answer has been-Nothing! कैथरीन मेंसफिल्ड के इन शब्दों को सोच कर एक अन्तहिन हताशा-सी महसूस होने लगती है.

मैं बहुत शीघ्र इंग्लैण्ड जाने की सोच रहा था-क्यूंकि पुतुल बीमारी के बाद बहुत कमज़ोर हो गई है.किन्तु पिछले वर्षों में मेरे और बकुल के सम्बन्ध इतने शिथिल और अप्रीतिकर हो गए हैं, की वहाँ सिर्फ पुतुल के लगाव के अलावा मुझे जाने का कोई अर्थ समझ में नहीं आता.यह दयनीय स्थिति है.वह मुझे अक्सर याद करती है-मैं कुछ महीनो के लिए जाना भी चाहता हूँ-किन्तु फिर दुबारा उसे छोड़कर आना और भी असहनीय और भयंकर जान पड़ेगा.मेरे लिए किन्तु डर का एक अन्य कारण भी है.मेरे जाने के बाद माँजी अकेली रह  जायेंगी-अगर वो स्वस्थ होती तो मुझे इतनी चिंता न होती.तुम्हारा वाशिंगटन का ट्रिप कैसा रहा?यदि संभव हो सके तो जोन बायज और डिलेन थॉमस के रिकोर्ड और वाल्टर बेंजामिन की पुस्तक Illuminations खरीद लेना.वह एक बहुत महान मार्क्सवादी लेखक थ-कुछ वर्ष पहले उनकी मृत्यु हुई थी.Martin Buber की पुस्तक 'I and Thou' यदि मिल सके तो ले आना.

आज ही बीना के विवाह का कार्ड मिला.अब तक बार बार यह ख्याल आता था की मैं भय्ये को कुछ लिख सकूँ-फिर दिन बीतते गए.विवाह कैसा रहा?तुम लोग खासतौर से व्यस्त रहे होंगे.Strange-I was there at the time of pain and death, and now at this time-I feel lost! मुझे कभी कभी यह सोचकर काफी विस्मय होता है की सुख के लम्हे तक पहुँचते पहुँचते हम उन सब लोगों से जुदा हो जाते हैं, जिनके साथ हमने दुःख झेल कर 'सुख' का स्वप्न देखा था.

(जुलाई 1971 में निर्मल जी लन्दन में रह रहे थे और माँजी के मृत्यु का समाचार मिला.निर्मल जी के लिए यह बात बहुत दुःख की थी की उनकी मृत्यु के समय वे लन्दन में रहे जिसे वह जिंदगीभर भूल नहीं सके)

लगता है अब मैं धीरे धीरे उस आभाव का आदी हो चला हूँ जिसके बारे में कुछ दिन पहले तक सोचा भी न था.दैनिक-घटनाओं के अंतहीन चक्र में जैसे बीच का यह खोखलापन बिलकुल स्थिर और शांत हो,मैं रोज काम पर जाता हुआ, वापिस लौटता हुआ, उसे देखता भी नहीं-जैसे वहाँ कुछ भी घटा बढ़ा न हो.विदेश में यह भ्रम, इस तरह का भ्रम बहुत दिनों तक चल सकता है-लेकिन कभी कभी कोई पुरानी स्मृति, इस भ्रम को बिजली की तरह काट जाती है और तब सब कुछ टूट जाता है, अपने पर किसी तरह का संयम नहीं रहता-और तब मुझे यहाँ, इस जगह उनके न होने का दुःख भी असहनीय लगता है क्यूंकि मेरे लिए वह उस क्षण से नहीं थीं, जब से मैंने घर छोड़ा था, और मैं सही मायनों में उनके न होने की भयानकता को केवल उस क्षण पहचान पाऊंगा, जब दुबारा घर लौटूंगा.


वह हम सब के बीच महज कड़ी नहीं थीं, हमें एक-दूसरे को जोड़ने के लिए-वह उससे कहीं ज्यादा थीं,एक केंद्रीय बिंदु, जिनके आसपास हम सब अपने अपने माल-असबाब समेत घूमते थे, वह हमें जोड़ती नहीं थीं, उनके रहते हम खुद-ब-खुद एक दूसरे के साथ जुड़े रहते थे.इसीलिए तुम्हारा पत्र मिलने के बाद पहला अनुभव दुःख का उतना नहीं, जितना गहरे अकेलेपन का हुआ, जैसे किसी ने एक झटके से मुझे अकेले में, बिलकुल अलग धकेल दिया हो.शायद यह एक बहुत डरावने किस्म की पीड़ा है जब आदमी चुप रहने के बावजूद यह महसूस करता है-की जाने वाला व्यक्ति अपने साथ उन खास शब्दों को भी हमेशा के लिए अपने साथ ले गया है जो केवल उनके साथ रह कर बने थे..और जो खुद हमारे भीतर मर गए हैं या कुछ अरसे बाद मर जायेंगे.मैं कभी-कभी सोचता हूँ-की माँजी की स्मृति हमारे लिए कभी भी पुराने अर्थों में 'स्मृति' नहीं बन पाएगी-जैसे दूसरे व्यक्तियों की होती है.वह थीं-और आ नहीं हैं-इन दोनों के बीच अंतराल इतना गहरा जान पड़ता है की कोई भी स्मृति इन दो छोटों को नहीं पाट सकती.

बीच के इन दिनों में कभी कभी एक पगली सी इच्छा होती थी मैं एकदम वापिस घर लौट आऊं-जैसे महज घर लौट जाने से ही मैं कुछ कर सकूंगा, जैसे लौटने के Physical Act में ही मैं अपनी घबराहट से छुटकारा पा सकूंगा-जैसे महज अजनबी कमरे में बैठे-बैठे उन्हें याद करना असंभव हो, असह्य हो.लगता है, वह अब नहीं हैं-यह जैसे महज एक समाचार है, एक अफवाह-और सिर्फ मेरे लौटने पर वह मेरे लिए एक घटना बन सकेगी.वह अब कभी पुतुल को नहीं देखेंगी-यह ख्याल बार बार आता है.

(देश वापस आने पर निर्मल जी शिमला में रहे, रामकुमार उन दिनों रानीखेत में रहते थे)

तुम्हारा पत्र कुछ दिन पहले मिला था.यहाँ एक के बाद दूसरा दिन कुछ इतना चुपचाप गुजर जाता है, की पता नहीं चलता की कोई पत्र मिले कितना अर्सा गुजर चूका है और तब अचानक एक दिन समय बीतने का अहसास होने लगता है जैसे मुद्दत से रुकी कोई घड़ी खुद-ब-खुद चलने लगी हो.

लन्दन से एकदम लौटने के बाद मैं कुछ दिनों तक काफी उखड़ापन महसूस करता रहा.अब दिन-रात के असीम अंतहीन घेरे में सब कुछ ठहरा और शांत लगता है.कुछ काम भी शुरू किया है, जो दिन की रूटीन के साथ अपने में सही लगता है.यों भी पहाड़ों पर रह कर हर असाधारण चीज-दुःख या सुख-अपनी सही जगह संभाल लेटे हैं-जैसे हम नहीं, खुद पहाड हमारी जिंदगी का बोझ उठा लेटे हैं-उन्हें कोई बोझ नहीं पड़ता, हम खुद ही हल्के हो जाते हैं.

(कुछ दिन निर्मल जी बुदापेस्ट गए थे)

हम पिछले एक सप्ताह से यहाँ हैं.रूस के अठारह दिन अनेक शहरों में घूमते हुए बीते.मोस्को के अलावा लेनिनग्राद और कीव भी गए थे.किन्तु सबसे सुखद समय जोर्जिया में गुजरा-बहुत आत्मीय और स्नेही लोग मिले.वहाँ मौसम भी बहुत अच्छा था-मार्च में दिल्ली की तरह-वरना मॉस्को में तो लगभग दिन-रात बर्फ गिरती रहती थी.किन्तु हमारा अधिकांश समय म्युजिअम्स और कला-संग्रहालयों में ही घूमने में बीत जाता था.एक दिन हम यासना पोलयाना भी गए थे-टॉलस्टॉय का घर बर्फ से घिरा था; कब्र भी सफेदी में लिपटी थी.मॉस्को में चेखव का घर देखने भी गए थे.लेनिनग्राद अपने में बिलकुल अलग शहर जान पड़ा-नदी गलियों ने बीच नहरें, दोस्तोव्स्की का मकान.मुझे लगता था, उस शहर में मैं महीनों अकेला रह सकता हूँ.बीच में सिर्फ दो दिन ही रहे-ठिठुरती सर्दी और बर्फ में ही पुराने दिनों की स्मृति दबी है.एक अदभुत अनुभव था, जब हम एक मॉनेस्ट्री
में गए,जो नीचे अंडरग्राउंड में दबी है;वहाँ मध्यकाल में भिक्षुक रहते थे-और वहीँ मरते भी थे.तापमान इतना ठंडा था,की उनके मृत स्व शताब्दियों से ज्यों के त्यों साबुत रहते थे; अब भी वहाँ के तहखानों में कफ़न से ढंके उनके शव और कोटरों में हड्डियों के ढेर दिखाई देते हैं.

(निधन के तीन-चार महीने पहले लिखा एक खत; दो सप्ताह के लिए निर्मल जी बैंगलोर से 30 किलोमीटर दूर विवेकानंद योग संसथान में रहे थे.सांस की बीमारी के चलते यह स्थान उन्हें डॉ.अमृता भारती ने सुझाया था.)

यहाँ आये हुए लगभग पन्द्रह दिन हो गए -अब जाने की घड़ी भी निकट आ गयी है.परसों मैं बैंगलोर चला जाऊँगा, जो यहाँ इस योग आश्रम से तीन किलोमीटर की दुरी पर है.यहाँ वैसे भी अँधेरा होते ही आकाश तारों से घिर जाता है.कुछ कुछ रानीखेत के रात्रि-आकाश जैसा.चारों तरफ वीरानी है-दूर दूर तक कोई बस्ती,गाँव,आदमी,ढोर कुछ दिखाई नहीं देता-लंबी-पीली घास का विस्तार,पेड़ों के झुरमुट और ज़मीन से उठी हुई चट्टानें.शाम को सैर करने निकलता हूँ, तो हवा के सायं-सायं के अलावा कुछ भी सुनाई नहीं देता.सुबह साढ़े चार बजे उठाना पड़ता है-और जहाँ पांच बजे प्रार्थना और योग-क्रीड़ाओं के लिए अपनी टोर्च हाथ में लिए निकलता हूँ, तो आकाश में तारों का वही झुरमुट दिखाई देता है-जो पिछली रात दिखाई दिया था.यहाँ की नियमबद्ध जिंदगी बिलकुल नहीं अखरती.हर अभ्यास से पहले गीता या वेद के श्लोक गाये जाते हैं, ताकि मन-शारीर-आत्मा के बीच एक शांतिपूर्ण सामंजस्य हो सके.अलग-अलग बिमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए विशेष किस्म के अभ्यास सिखाए जाते हैं.इन कुछ दिनों में इन सब नियमों और पाबंदियों का कायल हो गया हूँ,जैसे हमेशा से मेरी ऐसी ही जीवन शैली रही है.मेरे लिए यह एक विचित्र अनुभव है.मनुष्य जरूरत पड़ने पर अपने को किसी भी जीवन ढाँचे में ढाल सकता है, न शराब की तलब लगती है, न सिगरेटों की...जैसे इनकी कभी हमारे दैनिक जीवन में कभी जरूरत ही नहीं रही हो..

आज शाम यहाँ पहली वर्षा हुई है-बाहर बिजली चमक रही है, और बादलों की गडगडआहट सुनते हुए पहली बार अजीब अकेलेपन की अनुभूति हो रही है.

   बाकी बातें मिलने पर ही होंगी.


                                                    निर्मल 
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December 13, 2011

प्रिय राम(निर्मल वर्मा के पत्र)

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पिछले महीने पटना में एक किताब खरीदी थी - 'प्रिय राम'.इस किताब में निर्मल वर्मा के द्वारा अपने बड़े भाई चित्रकार रामकुमार को लिखे गए पत्रों का संकलन है, जिसका सम्पादन निर्मल जी की पत्नी श्रीमती गगन गिल ने किया है.जिस दिन मैं पटना से बैंगलोर आया था तो कुछ बातों से मन थोडा अशांत और अस्थिर था.उसी रात मैंने ये किताब पढ़ी.फिर तो जैसे एक अलग ही अनुभव हुआ.निर्मल वर्मा, जो मेरे प्रिय लेखक हैं उनके जीवन के उन पहलुओं को जाना जिनसे मैं अब तक अनजान था.पता नहीं क्यों लेकिन ये किताब पढ़ कर मुझे बहुत राहत मिली..बहुत से पत्र तो बिलकुल अपने से लगे. इन पत्रों में निर्मल जी जीवन की कुछ ऐसी बातें हैं जिनकी लगभग कोई जानकारी अब तक उपलब्ध नहीं थी.निर्मल जी और उनके बड़े भाई में किस तरह का स्नेह था ये इन पत्रों से साफ़ पता चलता है.जिस दिन मैंने ये किताब पढ़ी थी उसी दिन मैंने इन पत्रों में से कुछ यहाँ ड्राफ्ट में सेव कर लिया था.लेकिन बहुत दिनों तक इसे पोस्ट नहीं कर पाया.आज सोचा इसे ब्लॉग पर डालूं, फिर ख्याल आया की निर्मल जी के पत्रों से पहले उनके बारे में उनकी पत्नी और उनके बड़े भाई ने जो लिखा उसे यहाँ पोस्ट करूँ.निर्मल जी के पत्रों के कुछ अंश जो मैंने छांट कर अलग किये हैं,अगर संभव हुआ तो इसके बाद वाले पोस्ट में उसे डालूँगा.

निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल के शब्दों में : 

                ‘लिखना जैसे मेरे जीने का सहारा है...’  

यह शुरू से शुरू नहीं है.अभी मेरी त्वचा उनसे जुड़ी हुई है जबकि वह कहीं दूर चले गये हैं.लेकिन दूर भी कहाँ ? उसाँस लेती हूँ तो लगता है सुन रहे हैं.हाथ की लिख छोड़ी चीज़ छूती हूँ तो उनकी छुअन महसूस होती है.कागज़ में उनकी उँगलियों की गरमायी.

मैं जो जब उन्हें मिली थी, तो मरने की आकांक्षा, मरने की ज़िद से भरी बैठी थी.जुलाई 1979 में पौने बीस साल की मैं.अभी-अभी पचास पूरे कर चुके निर्मल जी.मुझे क्या मालूम था, बरसों बाद एक दिन मैं उन्हें इतने कष्ट में देखूँगी कि उनकी नहीं, मेरी साँस भी कण्ठ में से फँस-फँस कर बाहर आयेगी.

मुझे ताज्जुब तब हुआ, जब पिछले वर्ष, अभी-अभी वेंटिलेटर के मारक कष्ट में से निकले निर्मल जी ने साउथ अफ्री़की नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक जे. एम. कोएत्ज़ी की एक किताब पढ़कर दूसरी शुरू कर दी.एक दिन मैंने पूछा भी, 'इतने कष्ट में कैसे पढ़ लेते हैं ?' उन्होंने कहा था, 'सब प्राणियों में एक मनुष्य ही तो ऐसा प्राणी है, जिसके पास मानस है.माइंड, जिससे वह इस पृथ्वी पर अपने होने का अर्थ समझ सकता है.आखिर तक हमें इसका शोधन करते रहना चाहिए'.इससे पहले कि मैं उन पर पीड़ा की छाया देखती, उन्होंने पीड़ा को अपनी छाया से ढँक दिया था...

हम धीरे धीरे आखिर तक जा रहे थे.बिना जाने .

या शायद हम भी अपनी जिद पर कायम थे. बचने की नहीं, जीने की जिद पर

'आखिर तक' में कितनी परीक्षाएं उन्होंने दीं.कितनी मुझे देनी पड़ेंगी.ऐसी एक परीक्षा में मुझे बैठा कर वह चले गए हैं...


करीब दस साल पहले जब मैं रामकुमार के कृतित्व पर वढेरा आर्ट गैलरी के लिए एक सन्दर्भ पुस्तक सम्पादित कर रही थी, 'ए जर्नी विदइन', रामकुमार मेरे लिए शोध का विषय थे. निर्मल जी को जब मैं राम से हुई अपनी बातचीत के ब्यौरे बताती, वह खूब हँसते. खासकर जब मैं बताती कि आज इंटरव्यू के दौरान राम ने बीस सिगरेटें पीं.राम के धूम्रपान का सीधा सम्बन्ध टेप रिकॉर्डर के ऑन होने से जुडा़ था, जैसे ही मैं उसे बन्द करती, उनका सारा तनाव उड़ जाता.राम से जितनी भी सुन्दर बातें होतीं, तभी हो पातीं, जब टेप रिकॉर्डर बन्द होता. उन दिनों मैं कभी राम से मिलकर घर लौटती, तो निर्मल सबसे पहले यही सवाल करते, 'आज रामकुमार ने कितनी सिगरेटें पीं ?'

दोनों भाई अपने अपने क्षेत्र में कला की सुघड़ता के, कला के सत्य के कितने आग्रही रहे हैं, यह मेरे सीखने के लिए एक बड़ा पाठ रहा है.कला का सत्य स्वयं रचनाकार का सत्य हो, सार्वजनिक और निजी - दोनों आकाशों में गूंजता हुआ-यह दोनों की जीवन भर की साधना है.रामकुमार के अमूर्त चित्रों में मनन की छवियाँ किस प्रकार हमें ठिठका कर अवाक् कर देती हैं, सब जानते हैं.

निर्मल जी को एक-एक शब्द की प्रतीक्षा में घण्टों बैठे हुए मैंने देखा है.और फिर उन शब्दों को, जो नाड़ियों के जाने कौन से अंधेरे को लांघकर उनके कोरे कागज़ तक पहुँचते थे, काटते हुए भी. वह ईमानदार शब्द और सत्यवान शब्द के बीच अन्तर कुछ ही क्षणों में पकड़ लेते थे. उनकी कलम एक योगी की तरह शान्त और हत्यारे की तरह उत्सुक रहती थी. इतनी कष्टप्रद प्रक्रिया के बाद पाये एक-एक शब्द को वह उसी निस्संग निर्ममता से काट-छाँट देते थे-उनकी कॉपी जैसे किसी संग्राम में क्षत-विक्षत होकर मेरे तक पहुँचती थी.तिस पर भी मैं उन्हें दुबारा, तिबारा ड्राफ़्ट बनाने का श्रम-साध्य कार्य करते हुए देखती, तब भी जब उन्हें वे पन्ने केवल मुझे ही टाईप करने के लिए देने होते थे. विशेषकर 'अंतिम अरण्य' को टाईप करने के दिनों में मैंने उनके लिखे लगभग हर शब्द को उनकी रगों में से बाहर उजाले की ओर आते देखा था.साक्षात.

एक तरह से, और शायद सच्ची तरह से, निर्मल जीवन पर अपने छोटे भाई के छोटे भाई रहे.उन्होंने साहित्य का परिचय, लेखन और कला का संस्कार रामकुमार से ही लिया था.कला के रहस्यों को जानने का उल्लास, जो सुदूर बचपन में शुरू हुआ था, जीवन-पर्यंत बना रहा.एक ज़माना पहले, लगभग बीस साल की वर्ष एं शिमला के ग्लेन झरने पर मित्रों के साथ पिकनिक मनाते हुए, निर्मल ने राजकुमार को याद किया था.अभी उनके कागजों में एक चित्र मिला, कुछ सोचते से बैठे हैं, हलकी मूंछे, पीछे मित्रों का झुण्ड.तस्वीर के पीछे लिखा था - A day in Glen.To Dearest Ram Kumar-who is more than a brother...a sympathetic and sincere friend. Nirmal, 3 July, 1950.

जीवन भर दोनों भाइयों में स्नेह का नाजुक धागा बँधा रहा, बड़ी मज़बूती से.वे कहे के साथी थे, और अनकहे के भी.एक-दूसरे को देखकर वे जैसे उल्लसित हो उठते, हम पत्नियों के लिए विस्मिय का विषय था. 'इनकी कभी लड़ाई नहीं होती ?' मैं और छोटी भाभी जी एक दूसरे से पूछतीं. 

बाद के वर्षों में जैसे-जैसे निर्मल एक बौद्धिक सामाजिक भूमिका में अवस्थित होते गये, रामकुमार अपने भीतर की सीढ़ियाँ उतरते गये. पारिवारिक बैठकों में कई बार राम ने उन्हें उनकी आलोचना के क्रूर पक्ष से आगाह किया, लेकिन निर्मल के सारे संवेग हमारे अराजक समय में एक अर्थवान हस्तक्षेप करने में संलग्न हो चुके थे. यह विचार के प्रति उनकी गहरी आस्था थी, जिसके चलते हम उन्हें न रोक सकते थे, न बचा सकते थे, केवल लहूलुहान होते देख सकते थे.उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता उन्हें बेहद अकेला कर रही थी, उनके अपने इस अकेलेपन में भी अन्त तक वह कितने तेजस्वी बने रहे-इस तथ्य से उनके घोर विरोधी भी इनकार नहीं कर सकते.

निर्मल जी के जीते-जी और मृत्युपरांत भी उन पर तरह-तरह के क्षुद्र आक्षेप होते रहे हैं.इन अर्द्धसत्यों ने उनके बहुत सारे पाठकों को विचलित किया है, मुझे भी. लेकिन अब वह आइने के दूसरी ओर चले गये हैं और मेरे पास दुनिया से साझा करने के लिए केवल यह आग है, उनके दस्तावेजों की आग, जिसमें से तप कर वह गुज़रे थे...

ये पत्र अपनी ऐतिहासिकता में आज इसलिए महत्वपूर्ण हैं, कि इनमें उनके मोहभंगों के सूत्र हैं. वह एक दिन में कम्युनिस्ट-विरोधी नहीं हो गये थे और न एक दिन में भारत-प्रेमी. उनकी प्रज्ञा मूलतः प्रश्नाकुल थी, आलोचक नहीं. अपने इस अदम्य साहस में वह उपनिषदिक परम्परा के उत्तराधिकारी कहलाने के अधिक निकट थे, बजाय औपनिवेशिक संस्कृति की पैदावार होने के. अंग्रेज़ सरकार में पिता की नौकरी के कारण उनकी तालीम में अंग्रेज़ियत की प्रमुख भूमिका रही थी, और इसी कारण उन्हें ‘भारतीयता’ उतनी सहजता और बिना फांक उपलब्ध नहीं हुई थी, जितनी उनके कई मुखर आलोचकों को. लेकिन उन्होंने अपनी इस ऐतिहासिक स्थिति विशेष को न शर्मसारी का सबब बनने दिया, न अहं का.उनके आलोचक उन्हें शर्मसार करने में जुटे रहे, और उनके अधिकतर दुनियादार साथी अंग्रेज़ी दुनिया में सिक्का जमाने में.

निर्मल जी दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफ़न्स कॉलेज से निकलने वाले एक मात्र लेखक हैं जिन्होंने हिन्दी जैसी सादी भाषा को चुना.(सादी भाषा चुनना कई मायनों में सादी दुलहिन चुनने जैसा होता है, जहाँ आप उसके प्रेम के प्रति आश्वस्त होते हैं और दहेज न लाने के प्रति भी) बरसों पहले, और आज भी, जब अधिकांश भारती विदेशी जूठन बनने के लिए प्रस्तुत थे/हैं, निर्मल जी केवल अपने अन्तःकरण की आवाज़ सुनकर भारत लौट आये थे, जैसा इन पत्रों से स्पष्ट है.उन्होंने अपनी अस्मिता की भारतीय पहचान को टुकड़ा-टुकड़ा अर्जित किया था. न केवल अपने लिए, बल्कि अपने जैसे उन सब व्याकुल सुधीजनों के लिए, जो एक औपनिवेशिक दास-समय द्वारा स्वयं के रेखांकित किये जाने से उनकी ही तरह व्यथित थे. प्रायः निर्मल जी के अभावग्रस्त जीवन की चर्चा की जाती है, लेकिन मैं नहीं समझती, निर्मल जी ने जानते-बूझते अभाव का जीवन चुना था.उन्होंने केवल चुनाव किया था, उस भाषा में लिखने का चुनाव, जो उन्हें उनकी माँ की, उनके स्वप्न की बातचीत की भाषा थी. वह भाषा उन्हें जीवन भर साधारण वित्त का रखने वाली है, इस पर तो उन्होंने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा, किसी के आगाह करने पर भी नहीं.

प्रायः निर्मल जी के अभावग्रस्त जीवन की चर्चा की जाती है.लेकिन मैं नहीं समझती, निर्मल जी ने जानते बुझते अभाव का जीवन चुना था.उन्होंने केवल चुनाव किया था, उस भाषा में लिखने का चुनाव, जो उनकी माँ की, उनके स्वप्न की बातचीत की भाषा थी.वह भाषा उन्हें जीवनभर साधारण वित्त का रखने वाली है, इस पर तो उन्होंने शायद कभी सोचा ही नहीं होगा, किसी के आगाह करने पर भी नहीं..

वह स्वप्न और आदर्श में जीने वाले व्यक्ति थे. जीवन के अन्तिम समय तक न उनके आदर्श धुँधले पड़े न उनके स्वप्न और निर्मल जी थे, कि जाते-जाते दोनों चीज़ें अक्षुण्ण पीछे छोड़ गये.और अपनी अदम्य, अधक जिजीविषा-जिसे अब मुझे और उनके पाठकों को भरपूर जी कर पूरा करना है.ऐसी परीक्षा वह हमारी जाते जाते ले गए हैं....

निर्मल जी के निधन के बाद रामकुमार जी ने उन्हें एक अन्तिम पत्र लिखा था..उसके कुछ अंश:

(25.12.2005)
प्रिय निर्मल ,

इस बार इतनी लंबी यात्रा पर जाने से पहले तुम अपना पता भी नहीं दे गए.

यह अंतिम पत्र तुम्हे नहीं भेज सकूँगा.यह मैं हीं पढ़कर अपने पास सुरक्षित रख लूँगा तुम्हारे हमारे पत्रों के साथ.यह सोच कर मुझे आश्चर्य होता है कि तुम्हारे पैदा होना का दिन भी मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है, जब शिमला के हरबर्ट विला के एक कमरे में हम भाई-बहन बैठे थे और पीछे कमरे में से दाई ने आकार हमें सुचना दी कि लड़का हुआ है.तब मेरी उम्र पांच के करीब रही होगी.और 75 वर्ष बाद का वह अन्तिम दिन मेडिकल इन्स्टिटूट एम्बुलेंस में जाते हुए जब मेरे सामने स्ट्रेचर पर तुम आँखे बंद किये लेटे हुए थे, तब विश्वास नहीं हो रहा था कि तुम घर लौटकर वापस नहीं आओगे.एक अरसे बाद बिमारी के सब कष्टों और यातनाओं से मुक्ति पाकर तुम्हारे चेहरे पर ऐसी आलौकिक शान्ति और ठहराव कि छाया दिखाई दे रही थी मानो एक लंबी यात्रा का अन्तिम पड़ाव आ गया हो.तुम तो इस पड़ाव पर पहले ही पहुँच गए थे.अम्बुलेंस में तो केवल तुम्हारा पार्थिव शरीर ही था.एम्बुलेंस के सायरन की चीखें सुनते ही सड़क की भीड़, दिवाली के दिनों की रोशनियाँ, जगमगाती दुकानें गुज़रती रहीं और मैं सोचता रहा की यह रास्ता कभी समाप्त नहीं होगा.कई बार हमने तुम्हे उठाने की कोशिश की लेकिन एक लम्बे समय के बाद उस शांत निद्रा से तुम उठाना नहीं चाहते थे.

मकड़ी के जालों में उलझी पिछले 60-70 वर्षों की अनगिनत स्मृतियाँ आँखों के सामने धुंधली आकृतियाँ बनकर सजीव हो उठती हैं लेकिन उस यात्रा के पथ पर वापस लौटते हुए उसकी व्यर्थता और पीड़ा का अहसास भी होने लगता है.तुम्हे याद होगा कि जब कभी कुछ पीते हुए हम एक लंबे समय के लिए बैठते थे तो प्रायः बातचीत बहुत पुराने बीते हुए समय कि स्मृतियों में खो जाती थी.शिमला कि कोई पुरानी घटना ,या कोई व्यक्ति या परिवार का सदस्य हमारे बीच में उपस्थित हो जाता था.मैं तुमसे कहता था कि भज्जी हाउस,कैथू और शिमला को लेकर तुम्हे एक उपन्यास लिखना चाहिए.तुम मुस्कुराने लगते थे लेकिन कभी लिखने कि हामी नहीं भरी.और भी कितनी बातें अधूरी ही रह गयी.

पिछले एक वर्ष के दौरान तुमसे विभिन्न अस्पतालों में ही भेंट होती थी-विशेषकर मेडिकल इन्स्टिटूट के प्राइवेट वार्डों में.आज भी कभी कभी अचानक यह भ्रम होने लगता है कि तुम अस्पताल के किसी कमरे में लेते हो और शाम को तुमसे भेंट होगी.

वर्षों तक मित्रों, सम्बन्धियों आदि को पत्र लिखने में ख़ुशी ही होती थी, डाकिये को देखकर चिट्ठी पाने और पढने का कौतहुल होता था.समय बीतने के साथ साथ वे सब पीछे छूटते गये और पत्र मिलने की आदत ही छुट गई.अकेले तुम ही रह गये जिसे किसी दुसरे शहर से पत्र लिखकर अपने आप को हल्का-सा महसूस करता था.अपनी ख़ुशी और शंकाओं को तुम्हारे साथ बांटकर मैं अपने आप को अकेला महसूस नहीं करता था.यही बात तुम्हारे दुसरे मित्र, परिचित और सम्बन्धी भी महसूस करते थे.तुम बहुत धैर्य से उनकी बातें सुना करते थे जिससे तुम्हारे घर पर आने वाले लोगों का ताँता बंधा रहता था.चाहे वह दिल्ली हो, या शिमला या भोपाल -चाहे वे लेखक बनने के स्वप्न देखने वाले युवा छात्र हों, या प्रथिस्थित लेखक, चित्रकार या बुद्धिजीवी या तुम्हारे पुराने दोस्त-किसी को तुम्हारे घर आने में कूई हिचक नहीं होती थी.तुम खुली बाहों से सबका स्वागत करते थे.

कोई नहीं जानता था कि ये तुम्हारी जिंदगी के अन्तिम 20 दिन थे.वार्ड नंबर दो में कमरा नंबर 12 में तुम्हे देखने के आदी हो गए थे.तुम ऑक्सीजन का मास्क लगाये चारपाई पर लेटे दिखाई देते थे.रोज डॉक्टर तुम्हारी परीक्षा करके कहते थे कि तुम बिलकुल ठीक हो गए हो और जब चाहो तब घर जा सकते हो.इस बार तुम्हारी घर लौटने कि इच्छा नहीं थी.तुम्हारे मन में कहीं डर था.लेकिन अस्पताल में अधिक दिन तक रहना संभव नहीं था.

ये अन्तिम दिन देर तक याद रहेंगे.तुम जीवित रहते तो बाद में हम इन दिनों कि चर्चा अवश्य करते.

तुम्हे शायद याद नहीं कि कुछ महीने पूर्व जब वेंटिलेटर लगा हुआ था और तुम बोल नहीं सकते थे तो अचानक एक दिन कॉपी पर तुमने लिखा - "Am I dying?" हम चौंक गए और गर्दन हिला कर इंकार दिया और आश्वाशन दिया.तुम्हे ये विश्वास था कि अभी जाने का समय नहीं आया है और इस बार भी तुम स्वस्थ होकर ही लौटोगे.

उन दिनों अचानक तुम्हे बातें करने में बहुत आनंद आने लगा.शाम को भेंट होने पर तुम ऑक्सीजन का मास्क हटाकर बड़े उत्साह से बातें करने लगते.कुछ अस्वाभाविक भी जान पड़ता था.तब पता नहीं था कि कुछ दवाएं इतनी अधिक मात्रा में दी जा रही थीं जिनकी प्रतिक्रिया इस तरह प्रकट हो रही थी.तुम्हारे इस उत्साह को देखकर हमें भी बहुत खुशी होती थी और यह उम्मीद जगने लगी थी कि तुम स्वस्थ हो रहे हो.तब जान नहीं सके कि एक बहुत कमज़ोर धागे में तुम्हारी जिंदगी बंधी हुए है और यह कभी भी टूट सकता है.

कभी कभी तुम्हारे कष्टों को देखकर तो ऐसा लगता था की तुम्हे इससे मुक्ति मिले तो शायद वह बेहतर होगा.ज़िन्दगी के जिस कगार पर हम खड़े थे वहां कभी किसी को भी कुछ हो सकता था जिसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए.हम धीरे धीरे उस स्थिति के आदि हो गए थे.लेकिन आज तुम्हारे चले जाने के बाद कभी कभी अंधकार में वह धुंधली सी रौशनी में चमकती खाली जगह दिखाई देती है जहाँ हमेशा तुम दिखाई देते थे.अब वह खाली पड़ा है, कभी भरेगा भी नहीं.

यह अन्तिम पत्र लंबा होता जा रहा है 

अच्छा - 

                                रामकुमार 
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December 8, 2011

ड्राइविंग थ्रू द हिमलायस

,
अब ये एक पुरानी खबर हो गयी है.कम से कम एक महीने पुरानी खबर.जब से ये पोस्ट लिखा था मैंने तब से ही पता नहीं क्यों मैं इस पोस्ट को अपने 'कार की बात ' ब्लॉग पे पब्लिश नहीं कर पा रहा था(शायद फोटो पब्लिश नहीं हो रहा था)..तब से ये पोस्ट वहाँ ड्राफ्ट में पड़ा हुआ था, सोचा की आज इसे अपने इसी ब्लॉग पे पोस्ट कर दूँ..आखिर ये ऑटो-रेसिंग की दुनिया में एक अलग तरह के कीर्तिमान से सम्बंधित जो पोस्ट है.शायद कुछ लोगों को इस खबर के बारे में अभी भी कोई जानकारी नहीं हो..

आज से लगभग एक महीने पहले, जब रेड बुल एफ वन में नए नए कीर्तिमान बना रही थी और सेबस्टियन वेटेल कोरियन ग्रैंड प्री जीत कर अपने एफ वन विश्व चैम्पियन होने की खुशी मना रहे थे, ठीक उसी समय रेड बुल के डेमो स्क्वाड टीम, कुछ वरिष्ठ सदस्य और ड्राइवर नील जानी(भारतीय मूल के स्विस ड्राइवर) कुछ अलग करने के मूड में थे..ऐसा जो पहले कभी किया नहीं गया ऑटो-रेसिंग के इतिहास में.फोर्मुला वन इतिहास में एक नया कीर्तिमान स्थापित करने के लिए अपनी एफ वन कार(2005 RB1) को हिमालय स्थित दुनिया के सबसे ऊँचाई पर स्थित मोटरेबल पास लद्दाख में 'खारदुंग ला' ले गयी.यहाँ ड्राइविंग करना लगभग नामुमकिन है. और इस बात पर बहस होते रहती है की यहाँ ड्राइविंग करना सुरक्षित नहीं इसलिए यहाँ ड्राईविंग की अनुमति नहीं देनी चाहिए.यह समुद्र तल से 18,300 फीट की ऊँचाई पर है.

यह मुकाम हासिल कर के रेड बुल ने एक अलग तरह का कीर्तिमान बनाया है जिसके तहत किसी भी एफ वन कार को दुनिया की सबसे कठिन परिस्थितिओं के बीच ड्राइव करके यहाँ तक पहुंचाया गया.पहले तय किया गया था की रेड बुल के कार को कंटेनर में रख के वहाँ पहुंचाया जाएगा और फिर डड्राइवर नील जानी कार के साथ कुछ तस्वीरें खिंचवाएंगे.लेकिन नील और उनके साथी कुछ अलग सोच कर आये थे और कार को खारदुंग ला तक बेहद कठिन परिस्थितियों में ड्राइव कर के ले गए.

यहाँ पर अक्सर एलटीटूड शिकेंस(M या S आकार जैसा शार्प टार्न)की समस्या होती है.ऑक्सीजन की भी कमी रहती है जो बेहद तकलीफदेह है.ऑक्सीजन की कमी से ड्राइवर को तो परेशानी होती ही है लेकिन वहीँ एफ वन कार के परफोर्मेंस पर भी काफी असर पड़ता है, क्यूंकि एक एफ वन कार का बेहतर प्रदर्शन बहुत हद तक उसके 'एयर इनफ्लो' पे निर्भर करता है.एफ वन कार का ग्राउंड क्लिअरेंस भी अधिक नहीं होता..इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं की इस कीर्तिमान को स्थापित करने के लिए और इसे एक एतिहासिक ड्राइव बनाने के लिए रेड बुल ने कितनी मेहनत की होगी. 
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