Thursday, September 5, 2019

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर : शिक्षक दिवस पर खास

A Short note on Teachers Day - Kabir Doha on Guru, and Importance of Teachers along with Hindi Poems on Teachers day.
सुदर्शन पटनायक द्वारा बनाया गया, चित्र उनके ट्विटर से लिया गया 

आज शिक्षक दिवस है, यह दिन भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती 5 सितंबर को, उनके याद में मनाया जाता है. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के प्रख्यात शिक्षाविद और महान दार्शनिक थे. एक बार की बात है, सर्वपल्ली राधाकृष्णन के कुछ मित्र और दोस्तों ने कहा था कि वो उनका जन्मदिन सेलिब्रेट करना चाहते हैं, तब उन्होंने जवाब दिया - "मेरा जन्मदिन अलग से मनाने के बजाए अगर मेरा जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे गर्व महसूस होगा."

भारतरत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को 27 बार नोबेल पुरुस्कार के लिए नामित किया गया था. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा में बहुत विश्वास रखते थे और उनमें आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें विद्यमान थे, उनके याद में शिक्षक दिवस मानना हम सब के लिए एक गर्व की बात है.

आज के दिन उनके कुछ विचार यहाँ रखने का दिल कर रहा है -

  • शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें.
  • शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है. अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए.
  • किताबें पढ़ने से हमें एकांत में विचार करने की आदत और सच्ची खुशी मिलती है.
  • पुस्तकें वह माध्यम हैं, जिनके जरिये विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण किया जा सकता है.
  • ज्ञान के माध्यम से हमें शक्ति मिलती है. प्रेम के जरिये हमें परिपूर्णता मिलती है.


शिक्षक दिवस, शिक्षा और शिक्षक की बातें हों और ऐसे में हमें संत कबीर ने जो अपने दोहे के माध्यम से सीख दिया है, उन्हें न याद करें तो कुछ अधुरा सा लगता है. व्यग्तिगत तौर पर मुझे कबीर के दोहे ने बहुत प्रेरित किया है और एक अलग ही अनुभूति होती है उनके दोहे को पढ़ कर या सुन कर.

कबीर ने गुरु-महिमा में खूब दोहे कहे हैं, सभी को यहाँ लिख पाना संभव नहीं था, फिर भी मैंने अपने पसंद के कुछ दोहे इधर लिखे हैं, शायद आपको भी पसंद आये -

A Short note on Teachers Day - Kabir Doha on Guru, and Importance of Teachers along with Hindi Poems on Teachers day.


गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय । 
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥

गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।
गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।।

जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान । 
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और । 
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥ 

गुरु सो ज्ञान जु लीजिये, सीस दीजये दान।
बहुतक भोंदू बहि गये, सखि जीव अभिमान॥

गुरू पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत।
वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत।।

कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय।
जनम - जनम का मोरचा, पल में डारे धोया॥

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि - गढ़ि काढ़ै खोट।
अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान।
तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान॥

गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं।
कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं॥

गुरु मूरति गति चन्द्रमा, सेवक नैन चकोर।
आठ पहर निरखत रहे, गुरु मूरति की ओर॥

गुरु मूरति आगे खड़ी, दुतिया भेद कुछ नाहिं।
उन्हीं कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं॥

ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास।
गुरु सेवा ते पाइए, सद् गुरु चरण निवास॥

पंडित यदि पढि गुनि मुये, गुरु बिना मिलै न ज्ञान।
ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, सत्त शब्द परमान॥

कहै कबीर तजि भरत को, नन्हा है कर पीव।
तजि अहं गुरु चरण गहु, जमसों बाचै जीव॥

करै दूरी अज्ञानता, अंजन ज्ञान सुदये।
बलिहारी वे गुरु की हँस उबारि जु लेय॥

मनहिं दिया निज सब दिया, मन से संग शरीर।
अब देवे को क्या रहा, यो कथि कहहिं कबीर॥

जाका गुरु है आँधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फन्द॥

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुर मिलै, तो भी सस्ता जान ॥

- संत कबीर 

कबीर और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की बातें थोड़ी गंभीर हो गयीं, अब थोड़ा बाल मन से गुलज़ार साहब के लिखे इस गीत को सुन लीजिये, ये गीत फील्म किताब से है. बच्चों पर बनी एक उत्कृष्ट फिल्म है किताब, अगर आपने नहीं देखी है, तो फ़ौरन देख डालिए. इसी फिल्म का एक गीत मास्टरजी की आ गयी चिट्ठी यहाँ आपको सुना रहा हूँ - 





अ आ इ  ई, अ आ इ  ई
मास्टरजी की आ गयी चिठ्ठी 
चिठ्ठी में से निकली बिल्ली
बिल्ली खाये जर्दा पान
काला चश्मा पीले कान

कान में झुमका, नाक में बत्ती
हाथ में जलती अगरबत्ती
अरे नहीं यार मगरबत्ती
अरे बोला ना अगरबत्ती
मगरबत्ती, अगरबत्ती, मगरबत्ती, अगरबत्ती, मगरबत्ती
अगर मगर बत्ती
अगरबत्ती कछुआ छाप 
आग पे बैठा पानी ताप
ताप चढ़े तो कंबल तान 
VIP अंडरवेर बनियान

अ आ इ  ई, अ आ इ  ई
मास्टरजी की आ गयी चिठ्ठी 
चिठ्ठी में से निकला मच्छर
मच्छर की दो लंबी मूँछे 
मूँछ पे बाँधे दो दो पत्थर
पत्थर पे एक आम का झाड़
मूँछ पे लेकर चले पहाड़
पहाड़ पे बैठा बूढ़ा जोगी
जोगी की एक जोगन होगी

गठारी  में लागा चोर मुसाफिर
देख चाँद की ओर

पहाड़ पे बैठा बूढ़ा जोगी
जोगी की एक जोगन होगी
जोगन कूटे कच्चा धान
VIP अंडरवेर बनियान

अ आ इ  ई, अ आ इ  ई
मास्टरजी की आ गयी चिठ्ठी 
चिठ्ठी में से निकला छींटा
थोड़ा काला थोड़ा पीला
छींटा निकला है शर्मीला

अरे वाह वाह, चाल देखो
घूँघट डाल के चलता है
माँग में  सिन्दूर भरता है
माथे रोज़ लगाये बिंदी
इंग्लीश बोले मतलब हिन्दी
IF अगर IS है  BUT पर WHAT मतलब क्या
माथे रोज़ लगाये बिंदी
इंग्लीश बोले मतलब हिन्दी
हिन्दी में अलज़ेबरा छान

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने भी एक कविता लिखी थी, पाठशाला पर, सोचा आप सब के साथ वो भी साझा कर दूँ, ये भी हलके फुल्के अंदाज़ में कही गयी एक बेहतरीन कविता है - 

पाठशाला खुला दो महाराज
मोर जिया पढ़ने को चाहे!

आम का पेड़ ये
ठूंठे का ठूंठा
काला हो गया
हमरा अंगूठा

यह कालिख हटा दो महाराज
मोर जिया लिखने को चाहे
पाठशाला खुला दो महाराज
मोर जिया पढ़ने को चाहे!

’ज’ से जमींदार
’क’ से कारिन्दा
दोनों खा रहे
हमको जिन्दा

कोई राह दिखा दो महाराज
मोर जिया बढ़ने को चाहे
पाठशाला खुला दो महाराज
मोर जिया पढ़ने को चाहे!

अगुनी भी यहाँ
ज्ञान बघारे
पोथी बांचे
मन्तर उचारे

उनसे पिण्ड छुड़ा दो महाराज
मोर जिया उड़ने को चाहे
पाठशाला खुला दो महाराज
मोर जिया पढ़ने को चाहे!

जितनी पढ़ाई की बातें की जाती हैं, बहुत से कवि पढाई के बाद की समस्या जैसे शिक्षा-पद्धति, बेरोजगारी और नौकरी मिलने के संघर्ष पर भी कवितायेँ लिखी हैं. काका हाथरसी ने भी एक कटाक्ष किया है इस कविता में, वैसे वो इसे आज के दिन इधर रखने का कोई ख़ास अर्थ नहीं था, लेकिन ये कविता की ये तस्वीर आज भी दिखती है हमारे आसपास - 

बाबू सर्विस ढूँढते, थक गए करके खोज ।
अपढ श्रमिक को मिल रहे चालीस रुपये रोज़ ॥
चालीस रुपये रोज़, इल्म को कूट रहे हैं।
ग्रेजुएट जी रेल और बस लूट रहे हैं ॥
पकड़े जाँए तो शासन को देते गाली ।
देख लाजिए शिक्षा-पद्धति की खुशहाली॥

Tuesday, September 3, 2019

तीज की कुछ यादें, कुछ अभी की बातें और एक आधुनिक समस्या

Strolling down the memory lane on Teej Festival - तीज पर पुरानी कुछ यादें और साथ साथ कुछ तस्वीरें
इस साल के तीज पर बने पेड़किये

बचपन से ही तीज का पर्व मेरे लिए एक ख़ास पर्व रहा है. सच कहूँ तो उन दिनों इस पर्व का न तो कारण पता था और न महत्त्व या अर्थ, हम बच्चे तो बस तीज पर्व का इंतज़ार इसलिए करते थे कि इस पर्व में खोआ के पेड़किये (गुझिये) खाने को मिलते थे. तीज में हमारे तरफ पेड़किया, ठेकुआ बनना रिवाज है. 

उन दिनों आम तौर पर सब के घरों में सूजी के पेड़किये बनते थे, लेकिन बहुत से घरों में सूजी के साथ ही साथ खोआ और नारियल के पेड़किये भी बनाये जाते थे. मेरे घर में खोआ के पेड़किये शुरू से बन रहे हैं, और हम बच्चों को खोआ के पेड़किये फेवरिट थे.


पहले खोआ सूजी के मुकाबले महँगा मिलता था(अब भी खोआ महँगा ही मिलता है), तो उसके पेड़कीये कम अनुपात में बनते थे और सूजी के ज्यादा. मुझे याद है स्कूल से लौटते ही मैं माँ का पेड़किया, ठेकुआ बनाने में हाथ बँटाने लगता था, और देखते ही देखते उस समय ही पेड़किया गूंथना बहुत अच्छे से आ गया था मुझे, और मैं अक्सर कोशिश ये करता था, कि खोआ वाले पेड़किये में कोई निशान बना दिया करता था, जिससे पहचान सकूँ कि कौन सूजी का है और कौन से पेड़किये खोआ के बने हैं.

तीज पर्व का समापन सुबह के पूजे से होता था. हम भले ही स्कूल जाने के लिए सुबह उठने में आलस करें लेकिन तीज के पर्व के चलते हम सुबह सवेरे एकदम जाग जाते थे और इंतजार करते थे माँ के व्रत के खत्म होने का. जैसे ही तीज का व्रत समाप्त होता था, मैं और मेरी बहन मोना, टूट पड़ते थे खोआ के पेड़किया के ऊपर. दिन भर कम से कम पन्द्रह बीस तो निपटा ही देते थे हम लोग. माँ पीछे से डांटते रहती कि इतना नहीं खाया जाता, तबियत बिगड़ जाएगी, लेकिन जब खोआ के पेड़किये सामने हों तो तबियत की फ़िक्र कौन करता है? खोआ के चक्कर में हमेशा सूजी वाले पेड़किये उपेक्षित एक कोने में पड़े होते थे, उसको हम तब महत्त्व देते थे जब खोआ के पेड़किये खत्म हो जाते थे.

मैं और मेरी बहन अक्सर एक बात के लिए और डांट सुनते थे माँ से. हम खोआ के पेड़किया को पहचानने के लिए उसे हल्का सा तोड़ कर देख लेते थे कि अन्दर क्या भरा हुआ है. हमारे इस करतूत का असर ये होता था कि आधे से ज्यादा पेड़किया टूट जाया करते थे और माँ हमें डांटती थी कि हम एक भी पेड़किया को साबुत नहीं रहने देते थे. 

लेकिन ये स्कूल के दिनों की बातें थीं. स्कूल के  के बाद शायद ही कभी तीज त्यौहार में घर पर रहने का मौका मिला. और सच कहूँ तो समय के साथ साथ तीज से जुड़ाव कम होते चला गया. हाँ दो-तीन बार माँ जरूर मेरे साथ दिल्ली में तीज पर रही है, पर यकीन मानिये किसी भी त्यौहार का मज़ा तब तक नहीं आता जब तक आप अपने शहर में और अपने घर में न हो.

इस साल का तीज पर्व मेरे लिए थोडा ख़ास था. हर साल माँ के द्वारा तीज पर्व संपन्न होते हुए देखता था, इस बार मेरी पत्नी निक्की अपना पहला तीज का पर्व कर रही थी.

Strolling down the memory lane on Teej Festival - तीज पर पुरानी कुछ यादें और साथ साथ कुछ तस्वीरें


निक्की के द्वारा तीज पर्व किये जाने की ख़ुशी तो थी, लेकिन हलकी सी मेरी चिंता थी कि पता नहीं निक्की तीज का कठिन व्रत बिना किसी परेशानी के पूरा कर पायेगी या नहीं. मैंने कल ऑफिस जाते हुए इसे हिदायत दे रखी थी कि अगर हलकी भी परेशानी लगे तो बिना झिझक पानी पी लेना. लेकिन इसने पूरे दिन का व्रत अच्छे से और बिना किसी परेशानी के संपन्न किया.

सोचा तो था मैंने भी कि पहले के दिनों की तरह इस बार भी घर में रुक कर निक्की की मदद कर दूँगा पेड़किया बनाने में. ये भी पता चल जाएगा इससे कि इतने सालों के अंतराल के बाद मुझे पेड़किया बनाना याद भी है या मैं भूल गया हूँ. बचपन के दिनों में लेकिन बेफिक्री थी, और फुर्सत ही फुर्सत के पल थे. लेकिन अब ऑफिस का काम छोड़कर घर पर बैठना आसन काम नहीं है.

सुबह ऑफिस निकलने के पहले मैंने निक्की को सभी जरूरी हिदायत दे दिए थे, और कहा था कि मैं शाम में जल्दी घर आजाऊँगा, लेकिन किस्मत का फेर देखिये, जो दिल्ली मेट्रो एकदम सही टाइम पर चलती है, वो ऐसी रुक रुक कर चल रही थी कि बीस मिनट के मेट्रो के सफ़र को पूरा करने में करीब एक घंटे लग गए थे.

जल्दी जल्दी भागते दौड़ते घर पर आया, तब तक निक्की पूजा की लगभग सभी तैयारियां कर चुकी थी. उसनें सारे पकवान और प्रसाद भी अकेले घर में बिना किसी मदद के बना लिया था और फिर शाम में तीज पूजा का पाठ भी बहुत अच्छे और नियमबद्ध तरीके से पूरा किया. थोड़ा अच्छा भी लगा की इसनें सब कुछ का इंतजाम अकेले कर लिया, लेकिन साथ ही साथ थोडा अफ़सोस भी हुआ कि पहले ये सभी पर्व त्यौहार लोग मिल जुल कर मनाते थे लेकिन अब ज़िन्दगी इतनी अकेली हो गयी है, कि सभी लोग अलग अलग रह कर अकेले में ये सब पर्व त्यौहार मनाने को मजबूर हैं.

शाम के तरह ही सुबह भी तीज व्रत का पूजा होता है, और वो भी खूब अच्छे से और समय पर समाप्त हो गया. करीब चौबीस घंटे से भी ज्पयादा समय के बाद निक्की ने अपना व्रत तीज के ही प्रसाद से तोड़ा. खूब अच्छे से निक्की का पहला तीज पर्व संपन्न हुआ.

लेकिन आज के युग में सिर्फ पर्व में नियमबद्ध तरीके से पूजा कर लेना या रस्म-रिवाज निभा लेना मायने नहीं रखता. पर्व-त्यौहार का अब एक अभिन्न अंग है फोटोग्राफी, जिसके बिना कोई भी त्यौहार हँसी ख़ुशी निपटता नहीं नज़र आता.


पिछले वाक्य में कहे गए मेरी बातों से ये न समझिएगा कि मैं पर्व-त्योहारों पर तस्वीर लेने वालों के ऊपर कटाक्ष कर रहा हूँ, या कोई कमेन्ट कर रहा हूँ. सच कहूँ तो त्यौहार में फोटोग्राफी करने में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती, बल्कि बहुत अच्छा लगता है. कल से ही सोशल मीडिया पर तीज के रंगारंग तस्वीरों को देखकर मन प्रसन्न हो रहा है. लेकिन त्योहारों में अब तस्वीरें लेने में भी एक समस्या उभर कर सामने आती है, जिसका एहसास आज ही सुबह मुझे अचानक से हुआ और जिसकी वजह से मैंने ये लम्बा सा पोस्ट लिख दिया है.


सुबह निक्की ने तीज व्रत संपन्न किया, और उसनें फिर कुछ तस्वीरें क्लिक करने की ईच्छा जाहिर की. इसमें कोई दिक्कत नहीं थी, मैंने झट से अपना मोबाइल निकाला और दस-पंद्रह अच्छे फोटोज खींच डाले. लेकिन समस्या तब सामने आई, जब निक्की ने कहा कि हम दोनों की साथ की तस्वीर भी होनी चाहिए.


ये एक विकट समस्या थी. हम दोनों के साथ की तस्वीर? कैसे? खींचेगा कौन?


पहले के ज़माने में शायद इस प्रश्न का कोई हल नहीं था. जिन लोगों के पास अपना कैमरा और ट्राइपाड होता था, वो तो टाइमर लगा कर इस समस्या का हल निकाल लेते थे, लेकिन बाकी के लोग बस एक दुसरे की तस्वीर ही खींच कर संतोष करते थे. लेकिन अब ज़माना बदल गया है, अब इस समस्या का समाधान एक छोटे से बच्चे तक को पता है – सेल्फी कैमरा


आधुनिक युग में अगर आप शीर्ष के अविष्कारों का लिस्ट बनायेंगे तो उसमें मोबाइल का सेल्फी कैमरा बहुत ऊपर आएगा. शुरू में मुझे सेल्फी कैमरा बिलकुल पसंद नहीं था और मैं बहुत कम अपने फ़ोन का सेल्फी कैमरा इस्तेमाल करता था. मुझे जाने क्यों सेल्फी और सेल्फिश एक दुसरे के ही पर्यायवाची लगते हैं. थोडा ध्यान दीजिये अगर तो दोनों के अर्थ भी एक से ही हैं.


खैर, समय के साथ साथ मैं भी सेल्फी लेने में कम्फ़र्टेबल हो गया हूँ और सुबह की अपनी समस्या का हल भी मैंने कैमरा से एक सेल्फी फोटो खींच कर कर लिया, लेकिन दस-बारह सेल्फी तस्वीरें लेने के बाद भी मन माफिक तस्वीर नहीं आई. किसी तस्वीर में सिर्फ चेहरा आ रहा था, तो किसी तस्वीर से सर ही गायब था. अपने बाहों को अलग अलग एंगल से स्ट्रेच कर के तस्वीरें लेने के बाद आख़िरकार दो या तीन ऐसी तस्वीरें मिली जो थोड़ी ठीक थीं. 




हालाँकि मैं संतुष्ट तो फिर भी नहीं हुआ, लेकिन इस तस्वीर को फेसबुक पर पोस्ट कर के संतोष कर कर लिया. इसके बाद दिल में एक ख्वाहिश हुई, लगा कि काश हम दोनों की कोई तस्वीर पूरी क्लिक हुई होती, जैसे नार्मल तस्वीरें होती हैं, जिन्हें आप अल्बम में लगा सकें या फ्रेम करवा सकें, और जिसमें आप पूरे के पूरे नज़र आये, आधे कटे हुए नहीं, और जिसे आप बाद में चाहे तो अपने ड्राइंग रूम के दीवारों पर सजा सके. ये ख्वाहिश सेल्फी तस्वीर से मुमकिन नहीं है.


दो जोड़े जो अकेले किसी शहर में रह रहे हैं, उन्हें अक्सर ऐसे समस्या का सामना करना पड़ता है. जी हाँ, ये एक समस्या ही है, और इस बात पर मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ. हो सकता है, कि आपको लग रहा हो कि मैं बढ़ा चढ़ा कर बात बाल की खाल निकाल रहा हूँ, लेकिन साहब अकेले रह रहे कपल की ये बड़ी परेशानी है.


वो एक दुसरे की तस्वीरें तो खींच लेते हैं, लेकिन साथ की तस्वीरें नहीं ले पाते और अंततः सेल्फी लेकर काम चला लेते हैं. पर्व-त्योहारों में तो बेचारे मन मसोस कर रह जाते हैं, कि काश दोनों की कोई अच्छी सी, एक परफेक्ट तस्वीर खींच सके. बहुत लोग इस चक्इकर में एक जुगाड़ ढूँढ लेते हैं, एक सेल्फी स्टिक खरीद कर, लेकिन उसमें भी वे आधे कटे हुए ही नज़र आते हैं. एक परफेक्ट कपल तस्वीर की ख्वाहिश उनकी ख्वाहिश ही रह जाती है, जब तक उन दोनों की परफेक्ट कपल तस्वीर खींचने वाला तीसरा कोई व्यक्ति मौजूद न हो.
हो सकता है ये समस्या 99.999555 फीसदी लोगों(मैं भी इसमें शामिल हूँ) के लिए ये बस एक इलाजिकल और बेफुजुल बातें बनाने वाली है, लेकिन हुज़ूर कुछ लोगों के लिए ये एक गंभीर समस्या है. 

अब जैसे हर सवाल या समस्या के साथ होता है, कि उसके सामने आते ही हम उसका हल निकालने लग जाते हैं, इसके साथ भी वैसा ही हुआ. ये ख्याल सुबह आते ही मैं सोचने लगा आखिर इसका हल क्या हो सकता है? 


बाहुत मंथन(सिरिअस वाला) करने के बाद मैंने इसका एक उपाय निकाल लिया, और उपाय भी ऐसा वैसा नहीं, बल्कि एक बिजनेस आपर्टूनिटी भी दिखा मुझे.

आज जैसे हर कुछ के लिए एप मौजूद हैं. सब्जी-भाजी खरीदनी हो या किराना का सामान या फिर इलेक्ट्रीशियन या प्लम्बर को बुलवाना हो, सब के लिए एप है. तो क्यों न एक एप ऐसा भी बने जिसके जरिये हम कपल फोटो खींचने के लिए लो-कास्ट अफोर्डेबल किसी पेड फोटोग्राफर को बुक कर सके जो बहुत ही सस्ते दामों पर(पचास-सौ रुपये की शुरूआती फीस) हम बुक कर सकें.

 ज़रा सोचिये अकेले रह रहे कपल के लिए त्योहारों में ये कितना बड़ा वरदान का काम करेगा. सिर्फ त्योहारों में ही क्यों? रात को मिडनाइट बर्थडे या एनिवर्सरी केक कपल रात को काटते हैं, उस मौके पर हम पेड़ फोटोग्राफर बुक कर सकते हैं, कहीं आउटिंग के लिए जाएँ तब बुक कर सकते हैं...जैसे किसी कैब सर्विस को हायर करते हैं. लेकिन बस शर्त ये है कि कीमत कम होनी चाहिए, और हम जैसे लोगों के लिए डिस्काउंट कूपन की भी व्यवस्था होनी चाहिए, वरना हम जैसे लोग तो इसका फायदा नहीं उठा सकेंगे न.


मुझे पता है, आप इस पोस्ट को पढ़ कर हँस रहे होंगे, पोस्ट के कंटेंट की वजह से नहीं, बल्कि मेरे ऊपर, कि क्या बकवास लिख डाला है आज इसनें, लेकिन अकेले रह रहे जोड़े के बारे में एक बार सोच कर देखिये, एक बार दिल पर हाथ रख कर खुद से पूछियेगा, क्या ऐसी समस्या से आप कभी गुजरे नहीं? 

अगर हाँ, तो ऐसे किसी एप की माँग जोर शोर से की जानी चाहिए, इस पोस्ट को तब तक हर जगह शेयर करते रहिये जब तक कोई एप डेवलपर या छोटी मोटी कंपनी इस मूद्दे की गंभीरता समझते हुए ऐसा कोई एप बना न दे.

गुस्से में पैर पटकते हुए मेरे ब्लॉग से वापस जाने के पहले इस साल के तीज की एक और प्यारी तस्वीर देखते जाईये, मेरी बहन मोना और भांजे अयांश की.

जी हाँ, ये भी एक सेल्फी ही है. समझ रहे हैं न? :) 


आप सभी को तीज पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं !

Sunday, July 7, 2019

एक वो भी था ज़माना, एक ये भी है ज़माना..


बारिश हो रही हो, मौसम सुहाना हो गया हो और ऐसे में अगर कुछ पुराना याद आ जाए तो जाने क्या हो जाता है मन को. बेचनी सी हो जाती है, इस भाग दौड़ की ज़िन्दगी में भागते हुए मन पीछे देखने लगता है, वो पुराना वक़्त जो बीत चूका है और जो अब लौट कर वापस नहीं आ सकता. ना ही पुराने लोग वापस आ सकते हैं.

वक्त बदलते रहता है, जिंदगी कभी एक सी नहीं रहती...कुछ लोगों के लिए ये बदला वक्त खूबसूरत होता है तो कुछ लोगों के लिए बेरहम..बदलता वक्त जिंदगी की सबसे बड़ी और कड़वी सच्चाई है. और अक्सर बदलते वक़्त को देखते हुए, मन थोडा विचलित हो जाता है. अनजाने ही मन पुराने दिनों में लौटना चाहता है.

मेरे मोबाइल के प्ले लिस्ट पर बहुत से गाने हैं जो ऐसे मूड से लड़ने के उद्देश्य से रखे गए हैं, लेकिन ये गाने अक्सर मुझे अवसाद की खाई में धकेल देते हैं. अवसाद कहना भी ठीक नहीं होगा, लेकिन कुछ वैसा ही महसूस होता है, जब भी मैं पंकज उधास द्वारा गाया इस ग़ज़ल को सुनता हूँ, जिसे लिखा है ज़फर गोरखपुरी ने. जो बीते समय और आने वाले वक़्त की हकीकत को खूबसूरती से बयाँ करता है.

आज इतवार के दिन इस ग़ज़ल को सुनिए, और दो मिनट शांत बैठ कर महसूस कीजिये इसे -




 दुःख सुख था एक सबका
अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना
एक ये भी है ज़माना

दादा हयात थे जब, मिटटी का एक घर था
चोरों का कोई खटका, न डाकुओं का डर था
खाते थे रुखी सुखी, सोते थे नींद गहरी
शामें भरी भरी थी, आबाद थी दुपहरी
संतोष था दिलों को, माथे पर बल नहीं था
दिल में कपट नहीं था, आँखों में छल नहीं था...

थे लोग भोले भाले, लेकिन थे प्यार वाले
दुनिया से कितनी जल्दी, सब हो गए रवाना...

दुःख सुख था एक सबका
अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना
एक ये भी है ज़माना

अब्बा का वक़्त आया, तालीम घर में आयी
तालीम साथ अपनी, ताज़ा विचार लायी
आगे रवायतों से बढ़ने का ध्यान आया
मिटटी का घर हटा तो, पक्का मकान आया...
दफ्तर की नौकरी थी, तनख्वाह का सहारा
मालिक पे था भरोसा, हो जाता था गुज़ारा
पैसा अगर च कम था, फिर भी न कोई गम था
कैसा भरा पूरा था, अपना गरीब खाना..

दुःख सुख था एक सबका
अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना
एक ये भी है ज़माना

अब मेरा दौर है ये, कोई नहीं किसी का
हर आदमी अकेला, हर चेहरा अजनबी स
आंसूं न मुस्कराहट, जीवन का हाल ऐसा
अपनी खबर नहीं है, माया का जाल ऐसा
पैसा है मर्तबा है, इज्जत वी कोर भी है
नौकर हैं और चाकर, बंगला है कार भी है
जर पास है ज़मीन है, लेकिन सुकून नहीं है
पाने के वासे कुछ क्या क्या पड़ा गँवाना

दुःख सुख था एक सबका
अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना
एक ये भी है ज़माना

ऐ आने वाली नस्लों, ऐ आने वाले लोगों
भोग है हमनें जो कुछ वो तुम कभी न भोगो
जो दुःख था साथ अपने तुम से करीब न हो
पीड़ा जो हमनें झेली,  तुमको नसीब न हो
जिस तरह भीड़ में हम, जिंदा रहे अकेले
वो ज़िन्दगी की महफ़िल तुमसे न कोई ले ले
तुम जिस तरफ से गुजरों, मेला हो रौशनी का
रास आये तुमको मौसम इक्कीसवीं सदी का
हम तो सुकून को तरसे, तुमपर सुकून बरसे
आनंद हो दिलों में, जीवन लगे सुहाना...

दुःख सुख था एक सबका
अपना हो या बेगाना
एक वो भी था ज़माना
एक ये भी है ज़माना

Tuesday, March 19, 2019

बंद हो गयी भारत की सबसे आइकोनिक कार, जानिये क्यों थी खास और क्या था इतिहास

Short Notes on History of Maruti Cars In India, Maruti 800Dx, Maruti Omni, Maruti 1000 and Maruti Gypsy.
Photo: CarToq
पिछले सप्ताह, अचानक एक खबर आँखों के सामने आई, कि मारुती अपनी गाड़ी जिप्सी का प्रोडक्शन बंद कर रही है. एक लम्बे समय से मारुती जिप्सी घाटे में जा रही थी और अंततः मारुती ने अपने सभी शोरूम और डीलरों को एक आधिकारिक ईमेल लिखकर ये निर्देश दिया कि वे जिप्सी का अब कोई और नया बुकिंग नहीं एक्सेप्ट करे.

ऑटोमोबाइल सेक्टर में किसी मॉडल का बंद होना आमतौर पर संकेत होता है कि इसके जगह दूसरा मॉडल आएगा, जैसे पिछले साल दिसम्बर में मारुती ने घोषणा की थी कि वो आल्टो 800 का प्रोडक्शन बंद कर रही है और इसके जगह पर नयी और अपडेटेड आल्टो 800 मॉडल इस साल के अंत तक बाज़ार में आएगी. लेकिन यहाँ बात दूसरी थी. मारुती ने जिप्सी को पूरी तरह से बंद करने का फैसला लिया है. इसका अर्थ ये हुआ कि हिंदुस्तान की सबसे आइकोनिक गाड़ी अब आखिरी साँसें ले रही है.

Short Notes on History of Maruti Cars In India, Maruti 800Dx, Maruti Omni, Maruti 1000 and Maruti Gypsy.

बहुत से लोगों के लिए ये आम बात होगी. कुछ लोग ऐसे भी होंगे जिनके लिए ये खबर का कोई महत्व नहीं होगा लेकिन मेरे लिए ये खबर थोड़ी ख़ास थी.


एक वक़्त था जब मारुती जिप्सी मेरी सबसे पसंदीदा गाड़ियों में से एक थी. ऐसा कह सकते हैं यह मेरी ड्रीम कार जैसी थी. अपने समय में मारुती जिप्सी एक ऐसी गाड़ी थी, जिसमे स्टाइल, पॉवर, रफनेस, सब्सटांस, डिग्निटी और ब्यूटी सब कुछ मौजदू था. मिलिट्री, पोलिस, ऑफ-रोअडिंग, फैमली टूर, या फिर यूहीं लॉन्ग ड्राइव पर जाना हो, किसी भी तरह के ड्राइव के लिए ये एक उपयुक्त गाड़ी थी. मेरे ख्याल से ये मारुती और भारत की सबसे वर्सटाइल गाड़ी थी. लेकिन समय के साथ साथ ये गाड़ी अपने आप को मोल्ड नहीं कर पायी और अब बंद होने के कगार पर आ गयी है.

बदलते वक़्त के साथ आप नहीं बदलें तो वक़्त आपको बदल देगा 

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जिप्सी का प्रोडक्शन बंद क्यों हुआ इसकी कई वजहें हैं, जिसे संक्षेप में कहूँ तो बस इतनी सी बात है कि एक तरफ जहाँ आज की गाड़ियाँ आधुनिक तकनीक से लैस हैं, वहीं जिप्सी में पॉवरस्टीयरिंग, एयरबैग के साथ जरूरी सिक्यूरिटी और एमिशन नॉर्म्स उपलब्ध नहीं हैं जिसकी वजह से कंपनी ने इसे बंद करने का फैसला लिया है. वैसे तो मारुती की पार्टनर कंपनी सुजुकी ने पिछले साल जिप्सी के ही तर्ज पर एक नयी गाड़ी जिम्नी की घोषणा की है, और अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में ये गाड़ी इस साल आ भी जायेगी, लेकिन भारतीय बाज़ार में इसके आने की फ़िलहाल कोई सम्भावना नहीं है.

भारत की आइकोनिक गाड़ी थी मारुती जिप्सी  

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मारुती जिप्सी के साथ ही एक युग समाप्त हो गया. भारतीय सड़कों पर जिप्सी आज से करीब चौतीस साल पहले 1985 में आई थी और तब से लेकर अब तक भारतीय ऑटोमोबाइल इतिहास में सबसे लम्बे समय तक बिकने वाली प्रोडक्शन मॉडल गाड़ी है मारुती जिप्सी.

मारुती जिप्सी जितनी आम लोगों में मशहूर थी उतनी ही पुलिस और ख़ास कर के मिलिट्री में ये गाड़ी बेहद पसंद की जाती थी. ये एक हलकी गाड़ी है, जिसका वजन मात्र 900 किलोग्राम है जो इसे दुर्गम रास्तों पर चलने के लिए आसान बनता है और इसके कम वजन के चलते इसे हेलिकॉप्टर या एयरक्राफ्ट की मदद से आसानी से ऊंचाई वाली जगहों पर पहुंचाया जा सकता है. भारी एसयूवी के तुलना में इसे रेगिस्तान और बर्फीले रास्तों पर भी आसानी से चलाया जा सकता है. ये सब बड़ी वजह थी जिसकी वजह से ये गाड़ी भारतीय सेना की पहली पसंद बनी हुई थी.

मारुती जिप्सी का पेलोड करीब 500 किलोग्राम का है, इस वजह से भी इंडियन आर्मी की ये पसंदीदा सवारी थी, जिससे हथियार और सेना के इक्विपमेंट को एक जगह से दूसरी जगह आराम से ले जाया जा सके. इसकी फोर व्हील ड्राइव इसे सेना के लिए बिलकुल उपयुक्त गाड़ी बनती है. अब तक मारुती ने भारतीय सेना को करीब तीस हज़ार से भी ज्यादा मारुती जिप्सी सौंपी है.

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लेकिन अब समय बदला, इंडियन आर्मी ने भी जिप्सी के जगह टाटा सफारी स्टॉर्म को इस्तेमाल करने की घोषणा कर दी. मारुती की जिप्सी पहले से ही नुक्सान में चल रही थी, आर्मी इस गाड़ी की आखिरी आस थी, और इस खबर के आते ही जैसे जिप्सी का भविष्य तय हो गया था.

ऐसी बात नहीं थी कि जिप्सी का बंद होना टाला नहीं जा सकता था. कितनी ही गाड़ियाँ जो जिप्सी के तर्ज पर हैं जैसे फ़ोर्स गोरखा, महिंद्रा थार, इन सब एसयूवी ने खुद को वक़्त के साथ बदला और आज अपने अपडेटेड मॉडल को लेकर बाज़ार में छाई हुई हैं. लेकिन शायद कंपनी ने जिप्सी मॉडल पर से विश्वास ही खो दिया था, और अंततः इसे बंद करने की घोषणा हो गयी.

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मारुती जिप्सी भारत की सबसे सस्ती 4x4 एसयूवी थी, यानी की आल व्हील ड्राइव एसयूवी. जिप्सी की वैसे तो प्रोडक्शन फ़िलहाल बंद कर दी गयी है, लेकिन जो शोरूम में जिप्सी आर्डर किये जाने के तहत मिल रही हैं, उनकी कीमत लगभग छः लाख रुपये है.

मारुती जिप्सी मारुती उद्योग की उन चार आइकोनिक गाड़ियों में से एक है जिन्होंने भारतीय ऑटोमोबाइल जगत का रुख ही बदल दिया था.

देश की सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी का संक्षिप्त इतिहास

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Photo: Virendra Prabhakar/HT
भारतीय ऑटोमोबाइल में एक क्रन्तिकारी बदलाव तब आया जब 1983 में मारुती ने गाड़ियाँ बनानी शुरू की. संजय गाँधी ने मारुती लिमिटेड की स्थापना 1971 में की थी, इस उद्देश्य के साथ कि सस्ती पैसेंजर गाड़ी भारत में बन सके, लेकिन संजय गाँधी के निधन के दो साल पहले ही उनका ये ड्रीम प्रोजेक्ट बंद हो गया. फिर 1981 में मारुती की रेब्रन्डिंग की गयी और मारुती उद्योग के नाम से कंपनी को फिर से शुरू किया गया. ये बात कम लोगों को पता है कि मारुती ने मारुती 800 मॉडल के पहले एक गाड़ी का प्रोडक्शन किया था जो पूरी तरह भारत में निर्मित गाड़ी थी. उस गाड़ी का नाम मारुती 700 था. लेकिन मारुती की ये गाड़ी आते ही फ्लॉप हो गयी थी.

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Maruti 800DX, First Batch of Maruti 800.
फिर साल 1982 में मारुती ने सुजुकी कंपनी के साथ साझेदारी की और मारुती सुजुकी के लेबल तहत देश में अपनी पहली गाड़ी मारुती सुजुकी 800 को मार्केट में लांच की जो सुजुकी SS80 मॉडल के तर्ज पर बनी थी.14 दिसम्बर 1983 के दिन एक समारोह के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश की पहली मारुती 800 की चाबी हरपाल सिंह को सौंपी थी, जिन्होंने मारुती 800 के ओनरशिप राइट्स एक लकी ड्रा के तहत जीती थी.

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हरपाल सिंह, देश की पहली मारुती 800 के साथ 
मारुती 800 के एंट्री के साथ ही भारतीय मार्केट में एक हलचल मच गयी थी. कार प्रेमियों के लिए मारुती 800 का स्लीक हैचबैक मॉडल एक नया डिजाईन स्टेटमेंट बन गया था. मारुती 800 की धड़ाधड़ बुकिंग शुरू हो गयी. साल 1983 से लेकर 1990 तक मारुती ने एक के बाद एक चार गाड़ियाँ की प्रोडक्शन की और भारतीय ऑटोमोबाइल की शक्ल बदल कर रख दी.

मारुती 800 के लांच के अगले ही साल मारुती ने अपनी एक और पैसेंजर गाड़ी ओमनी वैन को लांच किया, जो सुजुकी के ही एक गाड़ी सुजुकी कैरी के मॉडल पर आधारित थी. मारुती ने ओमनी को दो केटेगरी में लांच किया था, एक कार्गो वर्शन और एक फैमिली कार वर्शन.

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ओमनी आम ग्राहकों के बीच पोपुलर तो थी लेकिन इससे ज्यादा मारुती ओमनी का इस्तेमाल कार्गो, टैक्सी, स्कूल वैन और एम्बुलेंस के लिए होने लगा था. ओमनी का स्लाइडिंग दरवाज़ा काफी हिट हुआ था. शायद इस लिए बॉलीवुड में किडनैपिंग के सीन को फिल्माने के लिए भी ओमनी और इसका स्लाइडिंग डोर इस्तेमाल किया जाता था. 

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Image: Team BHP
मारुती ओमनी बाज़ार में आते ही छा गयी थी. ओमनी के लांच के ठीक अगले ही साल मारुती ने अपनी सबसे आइकोनिक गाड़ी में से एक जिप्सी को लांच कर दिया. मारुती जिप्सी थी तो एक मिनी एसयूवी ही लेकिन ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट्स जिप्सी को उस समय बिक रही सबसे स्टाइलिश एसयूवी में से एक मानते थे.

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मारुती जिप्सी पेट्रोल से चलनी वाली एक एसयूवी थी जिसकी बनावट बेहद सिम्पल थी. मारुती की इस गाड़ी की सबसे ख़ास बात ये थी कि ये बिलकुल भी ओवर-इंजीनियर्ड गाड़ी नहीं थी, जिसके वजह से ये बेहद विश्वसनीय गाड़ी थी, जो बहुत कम ख़राब होती थी. मारुती जिप्सी गाड़ी आम लोगों के साथ साथ भारत के डिफेन्स सेक्टर में भी बेहद मशहूर हो गयी थी. उस वक़्त के युवा लोगों में ये गाड़ी ख़ास तौर पर लोकप्रिय थी.

तीन साल में ये तीन अलग-अलग सेगमेंट, हैचबैक, कैरी वैन और एसयूवी में गाड़ी को लांच करने के बाद मारुती एक और सेगमेंट में एंट्री करने वाली थी, जिसे लक्जरी सेगमेंट या सेडान कार सेगमेंट कहते हैं.

मारुती जिप्सी के लांच के दो साल बाद ही मारुती ने 1990 में अपनी सबसे महँगी और लक्जरी गाड़ी मारुती 1000 सेडान को लांच कर दिया. मारुती 1000 सेडान एक बेहद ही खूबसूरत और लक्जरी लुक लिए महंगी गाड़ी थी. मारुती 1000 भारत की सबसे पहली सेडान गाड़ी थी. इस गाड़ी की कीमत करीब पौने चार लाख रुपये थी. लोगों ने मारुती 1000 के लिए कहना शुरू कर दिया, एलिट कार फॉर एलिट पीपल. इस गाड़ी को अफोर्ड कर पाना उस वक़्त हर किसी के बस की बात नहीं थी.

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मारुती ने 1983 से लेकर 1990 तक लगभग हर सेगमेंट में गाड़ी लांच कर दी थी और उन दिनों जितनी भी ऑटोमोबाइल कम्पनियाँ थीं, उन सब से मारुती मीलों आगे निकल चुकी थी.

मारुती 1000 के लांच के तीन-चार साल बाद ही मारुती ने एक नयी लक्जरी सेडान मारुती एस्टीम को लांच कर दिया जो कि मारुती 1000 का ही अपग्रेडेड वर्शन था. दोनों गाड़ियों के डिजाईन में कोई फर्क नहीं था. बस इंजन और इंटीरियर में बदलाव हुए थे. धीरे धीरे सभी Maruti 1000 कारों को एस्टीम की बैजिंग दे दी गयी थी.

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मारुती एस्टीम, मारुती की ही 1000 के तर्ज पर जल्द ही लोगों में एक स्टेटस सिंबल कार बन गयी थी. ये एक लक्जरी सेडान थी लेकिन लगभग हर काम इस गाड़ी से आप कर सकते थे, चाहे ऑफ़रोअडिंग करनी हो या रेसिंग या फिर शहर में चलाना हो. ये कार बेहद वर्सटाइल थी. करीब पंद्रह साल चलने के बाद इसे 2009 में बंद कर दिया गया था.

वैसे तो मारुती ने ये चार कारों के अलावा भी कई कारें लांच की है, और सभी अपने समय की बेहद सफल कारें रही हैं. लेकिन ये चार कार ऐसी हैं जिन्होंने भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का रुख ही बदल कर रख दिया था. देश की पहली हैचबैक कार बनी मारुती 800, देश की सबसे पहली और सस्ती आल व्हील ड्राइव एसयूवी बनी मारुती जिप्सी, देश की सबसे पहली वर्सटाइल कैरी वैन बनी ओमनी और देश की सबसे पहली सेडान गाड़ी बनी मारुती 1000 और एस्टीम. इन कारों के अलावा मारुती जेन और आल्टो जैसी कारें भी हैं जो भारतीय मिडिल क्लास की गाड़ियाँ बनी. 

जब मारुती एक के बाद एक हर सेगमेंट की गाड़ियाँ लांच कर के मार्केट पर पकड़ बना रही थी, उसी समय कुछ और कम्पनियाँ थीं जो भारतीय मार्केट में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही थी. नब्बे के दशक में मारुती को उन कारों से बड़ी कड़ी टक्कर मिली थी. चाहे हौंडा की गाड़ी हो, फोर्ड की, हुंडई की या नब्बे के मध्य में लांच हुई टाटा की गाड़ियाँ.

मारुती की सबसे ख़ास बात ये थी कि देश में सबसे बड़ा सप्लाई चेन नेटवर्क मारुती का बन गया था. देश के हर कोने में इसके शोरूम और सर्विस सेंटर खुल गए थे. शायद यही वजह है कि बहुत सी गाड़ियाँ नब्बे के दशक में आई जरूर लेकिन भारतीय कार मार्केट में मारुती को नंबर एक के स्पॉट से कोई हटा नहीं सकी. लेकिन फिर भी उन सभी गाड़ियों ने मार्केट में अपनी एक जगह बना ली थी.

उन सभी गाड़ियों के छोटे मोटे किस्से और कैसे वो भारतीय सड़कों की आइकोनिक गाड़ियाँ बनी, कौन सी वे गाड़ियाँ थीं जिन्हें हम भूल चुके हैं, वो सब की जानकारी बहुत जल्द इसी ब्लॉग पर आपके सामने लेकर आऊँगा. तब तक मारुती का ये पुराना एक विज्ञापन देखें -






Wednesday, March 6, 2019

आईये, बंद दरवाजों का शहर से एक मुलाकात कीजिये


यूँ तो साल का सबसे खूबसूरत महिना होता है फरवरी, लेकिन जाने क्यों अजीब व्यस्तताओं और उलझनों में ये महिना बीता. पुस्तक मेला जो जनवरी के पहले हफ्ते में दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित होता है, उसे भी खत्म हुए दो महीने बीत गए. कुछ किताबें उस मेले से खरीदी थी, लेकिन जब परिस्थितियां अजीब हों तो किताब पढ़ने में भी ध्यान केन्द्रित नहीं हो पाता. अभी पिछले दो-तीन दिनों से थोड़ी राहत है तो किताबों के प्रति रुख फिर से किया है और ऐसा लग रहा है मानो जेट की स्पीड से किताबें पढ़ रहा हूँ मैं.

कल मैंने एक किताब के बारे में एक पोस्ट लगाई थी, और आज एक दूसरी किताब के बारे में लिख रहा हूँ. “काँच के शामियाने” जैसी हिट नॉवेल की लेखिका रश्मि रविजा की पहली कहानी संग्रह “बंद दरवाज़ों का शहर” के बारे में.

फ्लैशबैक 

रश्मि रविजा, जो कि मेरी बड़ी बहन रश्मि दीदी हैं, उनकी कहानियों का मैं शुरू से फैन रहा हूँ. पहले रश्मि दीदी की कहानियों को पढ़ने का एक ठिकाना होता था, उनका ब्लॉग “मन का पाखी”. मुझे याद है उन दिनों मैं बैंगलोर में था और बड़े बेसब्री से उनकी कहानियों का इंतजार करता था. एक सबसे अच्छी बात जो लगती थी रश्मि दी की कहानियों में, वो ये कि सेट-अप, किरदार सब जाने पहचाने लगते थे. लगता था ऐसा जैसे मैं पटना में बैठा हूँ और किसी से अपने आसपास की कहानियाँ सुन रहा हूँ. ऐसी फीलिंग बड़े जोर से तब और आती थी जब रश्मि दी पॉडकास्ट के माध्यम से अपनी कहानी अपनी आवाज़ में हमें सुनाती थीं.

मैं बहुत पहले से रश्मि दी से कह रहा था कि इन कहानियों को किताब की शक्ल दी जाए. लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, भाई की बातें दीदियाँ कब सुनती हैं? वो भी हर बार मेरी बात अनसुना कर देती थी. खैर, मेरी और मेरे साथ साथ बाकी करीबी लोगों के बार बार कहने का असर अंत में हुआ तो सही, और उनकी पहली नॉवेल काँच के शामियाने हमारे पास आ गयी.

नॉवेल तो आते ही हिट हो गयी, और उसपर मैंने इसी ब्लॉग पर लिखा भी था पहले. तो उस नॉवेल की बातें आज नहीं, आज दिन है रश्मि दी की पहली कहानी संग्रह “बंद दरवाज़ों का शहर” की.

इस किताब के छपने से पहले इस किताब से मेरा जुड़ाव कुछ इस प्रकार से हुआ कि रश्मि दी ने मुझसे भी सलाह ली थी किताब के शीर्षक के बारे में, उन्होंने मुझे दो तीन नाम सुझाये थे, लेकिन ये शीर्षक “बंद दरवाज़ों का शहर” मेरे मन में फ्रीज़ होकर रह गया था. मैंने उन्हें बता दी थी अपनी राय, फिर जब किताब की सुचना उन्होंने दी तो जानकार ख़ुशी हुई कि किताब का नाम वही था जो मुझे पसंद आया था.

मैं बाकियों के बारे में तो नहीं जानता, लेकिन इस किताब की अधिकतर कहानियाँ मेरे लिए अनजान नहीं थी. किताब के आने से पहले ही मैं पढ़ चूका था इन कहानियों को, और यकीन मानिये इन्हें दोबारा पढ़ना बिलकुल भी अखरा नहीं लगा. बल्कि सच कहूँ तो मैं इनमें से कुछ कहानियाँ तो दोबारा नहीं, कई-कई बार पढ़ चूका हूँ. रश्मि दी की कहानियों में कथ्य और शिल्प दोनों ही जबरदस्त होते हैं. किरदार अपने आसपास के लगते हैं, हमारी जानी पहचानी भाषा में, शैली में वो बातें करते है. बहुत कुछ याद आता है इनकी कहानियों को पढ़ते हुए, मन किसी नोस्टालजिक जर्नी से भी गुजरता है.

इस पोस्ट में मैं बुक-रिव्यु जरूर लिख रहा हूँ, लेकिन एक प्रॉपर बुक रिव्यु कैसे लिखा जाता है, वो विधा मुझे नहीं आती तो मैं बस अपने तरीके से इस किताब की कहानियों से आपका तार्रुफ़ करवाता हूँ.

किताब की बारह कहानियाँ


बंद दरवाज़ों का शहर में बारह कहानियाँ हैं, शुरुआत करते हैं शीर्षक कहानी “बंद दरवाज़ों का शहर” से. सुनने में आपको कोई मिस्टरी या थ्रिलर टाइटल लग सकता है लेकिन ये एक बेहद जरूरी और गंभीर कहानी है. बल्कि आज कल महानगरों की जो संस्कृति हो गयी है, हजारों आकाश से बातें करती हाउसिंग सोसाइटी खड़ी हैं और उनमें हजारों घर हैं लेकिन सभी घर के दरवाज़े बंद रहते हैं. इस शीर्षक का भी यही अर्थ है, कि हमारे ये महानगर सिर्फ एक बंद दरवाज़ों का एक शहर है. हर फ्लैट का दरवाज़ा बंद है, लोग अपनी अपनी दुनिया में गुम हैं, अन्दर किसके फ्लैट में क्या हो रहा है किसी को पता नहीं. ऐसे ही माहौल में ये एक ऐसी हाउसवाइफ की कहानी है, जो सारा दिन घर में अकेली रहती है, कितना घुटन भरा उसका जीवन हो सकता है और उस घुटन से बाहर आने के लिए उसनें जो रास्ता इख्तियार किया, वो शायद किसी भी तरह गलत नहीं है लेकिन हमारा समाज उस रास्ते को शायद गलत कह सकता है. ये कहानी महानगरों में अकेले रह रहे एकल परिवारों का सच है. कहानी पढ़ते वक़्त कई प्रश्न आपके मन में उठते हैं और जिनका उत्तर पता नहीं हमारे पास है भी या नहीं.

इस किताब की पहली कहानी “चुभन, टूटते सपनों के किरचों की”, दो बहनों की कहानी है. एक बहन दिल से सोचती है और दूसरी व्यावहारिक है. बड़ी बहन जो कहानी की नायिका है, उसनें अपनी छोटी बहन के लिए कुछ सपने देखे हैं और उसके सपने के पूरे होने में ही उसकी ख़ुशी है. वो चाहती है पारिवारिक दबाव की वजह से जो उसनें नहीं किया उसकी छोटी बहन वो सब करे, लेकिन क्या छोटी बहन भी बड़ी बहन की तरह सोचती है? वो बेहद व्यावहारिक है और यहाँ तक कि रिश्तों को भी व्यवहारिकता के तराजू पर तौलती है. छोटी बहन आज की मॉडर्न लड़की है जिसके लिए लाइफ सिक्यूरिटी, सुविधाएँ और अच्छी लाइफस्टाइल भावनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण है. तो क्या छोटी बहन के द्वारा लिए गए फैसले से बड़ी बहन खुश होती है या छोटी बहन के फैसले और उसकी बातों से बड़ी बहन के मन में कोई उथल पुथल मच जाती है? इन दोनों के रिश्तों की कशमश की कहानी है ये.

इसके बाद की कहानी एक लव स्टोरी है, मानस और शालिनी की कहानी जो “अनकहा सच” के शीर्षक से है. ये एक रेगुलर लव स्टोरी से इतर एक बेहद ही मासूम सी और शायद सच्चे प्रेम को दर्शाती एक अधूरी लव स्टोरी जो हमें ये बतलाती है कि प्यार का अर्थ सिर्फ पाना नहीं होता और बिना किसी को पाने चाह से, बिना कोई शर्त के उससे उम्र भर प्यार करना ही सच्चा प्रेम है. ये एक ऐसी कहानी है जो शायद आपके दिल के किसी कोने में बहुत समय के लिए फ्रीज़ होकर रह जाए.

मुझे रश्मि दी की कहानियों में एक बात बड़ी अच्छी लगती है, कि उनकी कहानियों में बहुत विविधताएँ होती हैं. जहाँ उनके कहानियों में कभी आपको गाँव की झलक दिखती है तो कभी छोटे शहर का परिदृश्य और कभी मेट्रो शहर की ज़िन्दगी और वहाँ का परिवेश, और अब कुछ बेहद कंविंसिंग. जैसे कि उनकी अगली कहानी जो एक मेट्रो शहर के फ्लेवर में है. “पराग तुम भी...” शीर्षक की ये कहानी आज के मॉडर्न कैरियर ओरिएंटड वर्किंग वीमेन की कहानी है और उसकी मानसिकता का बड़े ही खूबसूरती से विश्लेषण किया गया है. वीमेन इम्पाउअर्मन्ट के पक्षधर होने का दिखावा करते लोगों की सोच को उजागर करती हुई ये सम्सामियिक कहानी झकझोर देने वाली है.

अगली कहानी रश्मि दी की उनकी शुरूआती दौर की कहानी है, जब उन्होंने ब्लॉग के लिए कहानी लिखनी शुरू की थी, शायद तब की. कहानी का शीर्षक है "कशमकश". उनकी बेहद कम कहानी है जो किसी लड़के के पर्सपेक्टिव से लिखी गयी है. ये कहानी मेरे लिए रश्मि दी की उन कहानियों में से है जो मुझे अब तक याद है. इसकी एक पर्सनल वजह भी है कि मैं इस कहानी से बहुत रिलेट करने लगा था. ये कहानी एक बेरोजगार लड़के की है. बेरोज़गारी किसी को भी कैसे आत्मविश्वासहीन बना देती है, उसकी कहानी है. अंत इसका बेहद ही हिला देना वाला है, शायद आप ये कहानी पढ़ने के बाद बहुत देर तक उस लड़के से जुड़े रहे, शायद इसका अंत आपके मन को अंदर तक भिगो जाएगा. एक बेरोजगार युवक के मन:स्थिति का बहुत ही सहज वर्णन किया गया है इस कहानी में.

सचिन और तन्वी की भी एक कहानी है इसमें, जो "खामोश इल्तिजा" के नाम से है. बड़ी प्यारी सी भावुक और संवेदनशील कहानी है ये जो आपके मन को छू जायेगी. तन्वी एक डिवोर्सी है लेकिन सचिन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और वो उसे फिर भी चाहता है. तन्वी के संघर्ष की कहानी है ये, लेकिन इस कहानी का अंत ऐसा है जो आपके चेहरे पर एक मुस्कान ले आती है.

किताब की एक और बड़ी प्यारी सी कहानी “पहचान तो थी, पर पहचाना नहीं..” दो सहेलियों की अंजू और नमिता की कहानी है, जो वर्षों बाद यूँ ही मिल जाते हैं. दो अलग अलग परिवेश में रह रही दो सहेलियों की कहानी है, जिसका एक शब्द में कहूँ तो निचोड़ ये है कि “द ग्रास इज ऑलवेज ग्रीनर ऑन द अदर साइड”. अंजू को अपनी ज़िन्दगी से बड़ी तकलीफें हैं, लेकिन जब वो वर्षों बाद नमिता से मिलती है तो उसके रहन सहन और उसकी ज़िन्दगी में सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी को देखकर उसको अपनी ही ज़िन्दगी भली सी और अच्छी सी लगने लगती है. मुझे याद तो नहीं आता लेकिन शायद ये कहानी भी मैं पहले पढ़ चुका हूँ, या हो सकता है ये मेरा भ्रम हो. उन दिनों रश्मि दीदी की कहानियों को पढ़ना एक आदत थी.

किताब की एक और कहानी “होंठों से आंखों तक का सफर” एक विधवा के जीवन की करुण कहानी है जिसका सार इतना सा है कि बहुत सारे गम और संघर्ष के बाद मिलने वाली खुशी का एहसास ही कुछ खास होता है. ये एक बेहद ख़ास कहानी है, जिसे पढ़ते हुए शायद आपको लगेगा कि इसका अंत दुखद हो सकता है, लेकिन कहानी के अंत तक आते आते आपके होटों पर मुस्कान आ जायेगी. एक औरत के तपस्या और त्याग की कहानी है ये.

“दुःख सबके मश्तरक, पर हौसले जुदा” एक और स्पेशल कहानी है, जिसका शीर्षक मुझे बड़ा प्यारा लगा था. और कहानी के अंत में कहा गया शेर “दुःख सबके मश्तरक हैं, पर हौसले जुदा/कोई बिखर गया तो कोई मुस्कुरा दिया” इस कहानी का सार है. ये विपरीत परिस्थिति में संयम से सोच समझ कर फैसला लेने वाली लड़की लक्ष्मी के संघर्ष की कहानी है.

इस किताब में एक और गंभीर और जरूरी कहानी है “दुष्चक्र” के नाम से. ये साहिल की कहानी है जो बुरे सांगत में फंस जाता है और ड्रग्स के दलदल में दब जाता है. ये कहानी बेहद जरूरी कहानी है और उन पेरेंट्स के लिए एक चेतावनी भी है जो अपने बच्चों के आने वाले कल की योजना बनाते समय उनकी राय लेना भूल जाते हैं. अपने घर, माता पिता से दूर रह कर कैसे साहिल नशे के दलदल में फंस जाता है, और क्या आखिर में वो इस दलदल से निकल पायेगा? इन्हीं सब सवालों को लिए है ये कहानी दुष्चक्र.

“अनजानी राह” के नाम से एक कहानी है अनिमेष और अंकिता की, जो मुझे बेहद जानी पहचानी सी और अपनी सी लगी. ख़ास कर के अनिमेष का किरदार बहुत जाना पहचाना लगा. एक बेहद प्यारी सी लव स्टोरी इसे कहना सही होगा जो अंत तक आते-आते आपके चेहरे पर एक मुस्कान ले ही आएगी.

बदलता वक़्त इस किताब की आखिरी कहानी है, जो बेहद मार्मिक कहानी है. रत्नेश शर्मा नाम के एक शिक्षक की कहानी है जो अपना छोटा सा स्कूल चलाते हैं, लेकिन बदलते वक्त और तेज़ी से फैलते आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा को परोसते स्कूल की वजह से उनके स्कूल में बच्चे पढ़ने आना बंद कर देते हैं, यहाँ तक कि उनका बेटा भी उनके पढाई के तरीकों में और शिक्षा पद्दति में कमियां निकालने लगता है. लेकिन वो कहते हैं न कि एक अच्छे और आदर्श शिक्षक को उनका सच्चा विद्यार्थी कभी नहीं भूलता, कुछ कुछ ऐसा ही अंत है इस कहानी का भी. मुझे जाने क्यों इस कहानी में एक कमी नज़र आई, कि कहानी कुछ जल्दी खत्म हो गयी. थोड़ी कहानी और बढ़नी चाहिए थी. इस कहानी को पढ़ने के बाद हो सकता है आपको ऋषि कपूर की एक फिल्म “दो दूनी चार” का क्लाइमेक्स भी याद आ जाए. चेहरे पर एक मुस्कराहट जरूर आ जायेगी इस कहानी के अंत में.

रश्मि रविजा के कहानियों में ख़ास क्या है?


मुझे रश्मि दी कहानियों में सबसे मजबूत उनके किरदार लगते हैं. जाने कैसे रच लेती हैं वो ऐसे किरदारों को. देखा जाए तो उनकी हर कहानियों के किरदार एक दुसरे से एकदम अलग हैं और बिलकुल आपके आसपास के लोग जैसे लगते हैं वो. शायद यही वजह है कि इन किरदारों की कहानियाँ पढ़ते वक़्त लगता है कि ये हमारे आसपास की कहानी है. अपने शहर के परिवेश और मानसिकता को जबरदस्त तरीके से अपनी कहानियों में उतारती हैं दीदी.

इस किताब की कहानियाँ बहुत समय तक आपको अपने गिरफ्त में रख सकती हैं. कहानियों का प्रवाह ऐसा है कि आप सिर्फ एक कहानी पढ़ कर किताब रख नहीं सकते, पूरी किताब खत्म कर देते हैं एक ही सीटिंग में. एक और जबरदस्त बात ये है कि इनकी कहानियों में और ख़ास कर के इस किताब में गज़ब की डिटेलिंग है. मतलब इस किस्म का डिटेलिंग आम तौर पर अब कहानियों में नज़र नहीं आता.

लास्ट वर्ड्स


मेरे ख्याल से अगर आपको सामाजिक, व्यग्तिगत और गंभीर मुद्दों पर कहानियाँ पसंद आती हैं, तो ये किताब और इसकी कहानियाँ आपके लिए है.

इस किताब की कीमत सवा दो सौ रुपये है और आप इस किताब को अमेज़न के जरिये मँगवा सकते हैं

Tuesday, March 5, 2019

पढ़िए देशी चश्मे से लन्दन डायरी



बड़े दिनों बाद आज हाज़िर हूँ अपनी नयी पोस्ट लेकर. अगर कायदे से देखा जाए तो इस पोस्ट को आने में डेढ़ महीने की देरी हो गयी है. मुझे खुद अब तक विश्वास नहीं हो पा रहा है कि जनवरी में मुझे ये किताब मिली थी और मैंने उसके बारे में अब तक नहीं लिखा था.


क्या है देशी चश्मे से लन्दन डायरी?

देशी चश्मे से लन्दन डायरी”, जैसा कि शीर्षक से प्रतीत भी होता है ये शिखा वार्ष्णेय(जो मेरी शिखा दीदी हैं) के उन आलेखों पर आधारित है जो लन्दन से उन्होंने भारतीय मीडिया के लिए लिखा था. शिखा दी ने अपने इस किताब के माध्यम से अपने लन्दन के अनुभवों की बहुत सी रोचक जानकारियां हमारे सामने प्रस्तुत की हैं

देशी चश्मे से लन्दन डायरी और स्मृतियों में रूस

मैं अगर सच कहूँ, तो मेरी ये पोस्ट किताब का रिव्यु होते हुए भी एक बुक-रिव्यु-पोस्ट नहीं है, क्योंकि अक्सर रिव्यु बड़ा सपाट सा होता है. लेकिन मेरे लिए इस किताब का रिव्यु लिखना एक नॉस्टैल्जिक जर्नी से गुजरने जैसा था. इस किताब को पढ़ना बहुत हद शिखा दी कि पहली किताब “स्मृतियों में रूस” को पढ़ने के एक्सपीरियंस से गुज़ारना था. मुझे आज भी याद है जब पहली बार स्मृतियों में रूस खरीदने मैं डायमंड बुक्स के दफ्तर गया था, और जैसे ही किताब हाथ में आई थी तो जैसे भयानक गूसबम्प मिले थे. बड़ा ही अनोखा एहसास था किताब को हाथ में लेने का और पढ़ने की उत्सुकता ऐसी थी कि किताब खरीदते ही मेट्रो के आधे घंटे के सफ़र में लगभग मैंने किताब पूरी खत्म कर ली थी.

देशी चश्मे से लन्दन डायरी में भी कुछ इसी तरह की उत्सुकता रही थी. इस बार किताब खरीदने पब्लिकेशन हाउस के दफ्तर नहीं जाना पड़ा था, बल्कि घर बैठे ही अमेज़न से किताब मंगवा ली थी मैंने. जिस दिन किताब आई थी, उसी रात इस किताब को पढ़ लिया था लेकिन कुछ परिस्तिथियाँ ऐसी बन गयी कि इस किताब के बारे में कुछ भी लिख नहीं पाया था कहीं.

देखा जाए तो मुझे शिखा दी की पहली किताब स्मृतियों में रूस और देशी चश्मे से लन्दन डायरी में बहुत सी समानताएं दिखी हैं. जहाँ स्मृतियों में रूस में आपको रूस के बारे में बहुत छोटी छोटी बातें और एक्सपीरियंसेज पता चलते हैं वहीं इस किताब में लन्दन और इंग्लैंड के कल्चर और वहाँ के रहन सहन के बारे में जानने को मिलता है. अंतर बस इतना है कि स्मृतियों में रूस शिखा दी के उन दिनों के अनुभवों पर आधारित है जब वो कॉलेज में पढ़ती थी, और ये नयी किताब संभवतः अभी के उनके अनुभवों पर आधारित हैं जब उनके बच्चे कॉलेज में पढ़ रहे हैं. 

सूरज ब्रिटेन के साम्राज्य में ही उदय होता है और अस्त भी 


बहुत कम ऐसी किताबें होती हैं जो बेहद ही सरल और रोजमर्रा की भाषा में किसी शहर और देश के परिवेश के बारे में वहाँ के रहन सहन, लोगों की मानसिकता और क संरचना के बारे में हमें बताती हैं और ये किताब वैसी ही एक किताब है. जैसा कि किताब के शीर्षक से जाहिर होता है कि इस किताब के माध्यम से शिखा दी अपनी नज़रों से हमें अपने आसपास का माहौल और पूरा इंग्लैंड दिखलाती हैं. किताब का हर एक प्रसंग, टॉपिक इतने दिलचस्प तरीके से बयान किया गया है कि अनायास ही आप अगला टॉपिक पढ़ने के लिए उत्सुक हो जायेंगे.

शिखा दी ने देशी चश्मे से लन्दन डायरी को एकदम शुरू से शुरू किया है. मतलब कि पहले प्रसंग में उन्होंने ब्रिटेन के गौरवशाली इतिहास के बारे में एक झलक दिखलाई है और वहां के राजशाही ठाट-बाट के बारे में बताया है. एक समय था जब आर्थिक आधार से इंग्लैंड सबसे मजबूत देश था लेकिन अब वहां की इकॉनमी स्लोडाउन पर है और मंदी का असर वहाँ के बाज़ार में है. लेकिन ऐसे माहौल में भी वहाँ क्वीन इस साल हीरक जयंती मना रही हैं. जहाँ एक तरफ लोगों के जरूरतों के तरफ ध्यान देना चाहिए वहाँ रॉयल सेलिब्रेशन पर खजाने लुटाये जा रहे हैं. इन सब के बीच शिखा दी वहाँ के रॉयल सेटअप से भी हमारी जान-पहचान करवा जाती हैं.

ये किताब बड़े अलग अलग मूड को साथ लेकर चलती है, जहाँ सीरियस मुद्दे भी हैं और वहीं कुछ ऐसे मुद्दे जिनके बारे में आपने सोचा नहीं होता है. जैसे कि अगला टॉपिक इस किताब में आपको लोमड़ी पर मिलता है. चौंक गए न? मुझे भी थोड़ा आश्चर्य हुआ था शीर्षक देख कर और इस प्रसंग को पढ़ते हुए ये जानकार और भी आश्चर्य हुआ कि जैसे दिल्ली में बंदरों का आतंक है वहाँ लोमड़ी का आतंक है. ये सच में एक गंभीर समस्या है लेकिन मेरे चेहरे पर पता नहीं क्यों इस भाग को पढ़ते हुए चेहरे पर हल्की हँसी चली आई थी.

बढ़ता बाजारवाद और अकेले होते बुजुर्ग 

इस किताब के माध्यम से हमें लन्दन में रह रहे बुजुर्ग-वर्गों के बारे में भी पता चलता है और ये समझ आता है कि उनकी ज़िन्दगी वहाँ बहुत आसन नहीं होती है. उम्र के इस पड़ाव पर आते आते वे अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं. हमारे यहाँ जिस तरह से बुढ़ापे में भी घर भरा होता है, बेटा, बहु, बेटी, दामाद, पोते, पोती सब आसपास मौजूद रहते हैं, वहाँ अधिकतर बूढ़े लोग अकेले ज़िन्दगी बिता रहे हैं. एक उधाहरण के तौर पर शिखा दी अपनी एक पड़ोसी के बारे में बताती हैं जो साल में बस एक बार अपने पोते-पोतियों से मिल पाती हैं और उन्हें खूब याद करती हैं. ये टॉपिक पढ़ते हुए मुझे जाने क्यों हमारे समाज में तेज़ी से हो रहे बदलाव की बात याद हो आई, जिसका जिक्र शिखा दी ने भी किताब में भी किया है कि हम अनजाने में ही वहाँ की ये प्रवृति अपनाते जा रहे हैं और अब हमारे यहाँ के बुजुर्ग भी अकेले होते जा रहे हैं.

किताब में वहाँ के इकॉनमी और बाज़ारों की भी एक झलक देखने को मिलती है. इंग्लैंड अभी मंदी का मार झेल रहा है और इस वजह से वहाँ के युवाओं को दिक्कत तो आ ही रही है, साथ ही साथ वहाँ के स्कूली छात्र-छात्राओं को भी नार्मल स्कूलिंग में भी बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. वहां मंदी का असर तो है लेकिन इसके बावजूद बाजारवाद बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है. शिखा दी किताब में बताती हैं कि कैसे वहाँ क्रिसमस के समय पर बाजारवाद अपने चरम पर होता है. लोग गिफ्ट्स और डिस्काउंट पर सामान लेने के लिए दुकानों के बाहर सुबह तीन बजे से लाइन में खड़े होकर दुकान खुलने का इंतजार करते हैं. मंदी के बावजूद इस तरह के बाजारवाद से थोड़ा आश्चर्य तो होता है. शायद मंदी का ही असर हो कि वहाँ बेरोज़गारी भी खूब बढ़ रही है और बढ़ती बेरोजगारी और गिरती इकॉनमी के चलते वहाँ के युवा डिप्रेशन और एंग्जायटी के गिरफ्त में आ रहे हैं.

वैसे सच कहूँ तो इस किताब में ये सब पढ़ते हुए बहुत से लोगों को काफी आश्चर्य हो सकता है क्योंकि बहुत से लोग अब भी इंग्लैंड को एक बेहद स्ट्रोंग और डेवलप्ड देशों की तरह देखते हैं लेकिन उन्हें वहां की कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था के बारे में पता नहीं है. ये किताब बहुत ही सहजता से उन सभी पहलुओं के बारे में हमें जानकरी देती हैं.

इस किताब के माध्यम से ये भी पता चलता है कि वहाँ क्राइम भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं जिसमें मुख्य रूप से टीन-एज क्राइम शामिल हैं. वैसे देखा जाए तो युवाओं में बढ़ता क्राइम असल में सिर्फ इंग्लैंड ही नहीं बल्कि ये हर देश की समस्या है. भारत में भी तो पिछले कुछ सालों में टीनएज क्राइम बहुत ज्यादा बढ़ गया है. ये हर देश के लिए शायद सबसे सीरियस इशू है जिसका हल खोजना बेहद जरूरी है.

इन सब विषयों के अलावा इस किताब में और भी बातें शिखा दी ने कही हैं, जैसे वहाँ के स्कूल के पाठ्यक्रम के बारे में, वहाँ के वीआईपी कल्चर के बारे में भी हमें पता चलता है और ये भी मालूम होता है हमें कि हमारे यहाँ के जैसे ही वहाँ भी मेले लगते हैं और जैसा की हमारे शहरों में आजकल ऑफिस में काम कर रहे लोगों के लिए टिफ़िन सर्विस है, वहाँ भी ये व्यवसाय खूब डिमांड में है. इन सब के साथ एक और मजेदार बात जो मुझे इस किताब के जरिये मालूम हुई वो ये कि लन्दन में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो घोर अन्धविश्वासी हैं. झाड़ फूँक करने वाले बाबाओं की वहाँ भी कमी नहीं है. लाइव इन का भी टॉपिक इस किताब में लिया गया है, ये एक ऐसी टॉपिक है जो आज कल हमारे यहाँ काफी ट्रेंडिंग है. हमारे यहाँ फिल्म विकी डोनर से बहुत से लोगों को शुक्राणुदान के बारे में पता चला है, लेकिन फिर भी अभी इस टॉपिक पर यहाँ खुलापन नहीं है और बहुत बड़ा वर्ग है जो इसे गलत मानता है. लेकिन लन्दन में इस कार्य को लोग परोपकार की दृष्टि से देखते हैं.

शोर ही शोर, एवरी ओर

लन्दन के चुनाव प्रक्रिया के बारे में भी शिखा दी बताती हैं कि कैसे वहाँ चुनावी प्रक्रिया बेहद शान्ति से निपट जाती है, कोई आवाज़ कोई हल्ला हँगामा नहीं, बड़े ही शालीनता से वहाँ की चुनावी प्रक्रिया खत्म होती है. ये शायद एक ऐसी जानकारी है जिसपर बहुत से लोगों को विश्वास नहीं हो पायेगा, क्योंकि हम तो अक्सर चुनावों में लाउडस्पीकरों का शोर, और हर तरफ गज़ब का शोर-शराबा सुनने के आदि हैं.

हमारे देश में तेज़ी से बढ़ता ये ध्वनि प्रदुषण एक बेहद गंभीर समस्या है. चाहे वो इलेक्शन के वक़्त हो, या तेज़ आवाज़ में बजते भजन कीर्तन के गाने या फिर गाड़ियों के हॉर्न का शोर, हर तरफ बस शोर ही शोर है. लन्दन में लेकिन ऐसी हालत नहीं है. शिखा दी बताती हैं कि वहां सड़कों पर गाड़ियाँ चलाते वक़्त लोग हॉर्न नहीं बजाते. बहुत जरूरत पड़ने पर ही वहाँ हॉर्न बजाये जाते हैं, लेकिन यहाँ तो हम जब तक अपने गली से निकलते वक़्त दस बार हॉर्न नहीं बजायेंगे, लगता ही नहीं कि ड्राइविंग हमारी सफल हुई है. इस किताब का ये भाग पढ़ते हुए मुझे बहुत पहले देखी हुई एक डाक्यूमेंट्री विडियो भी याद आई जिसमें एक इटालियन व्यक्ति यही कह रहा है, ऑन इंडियन स्ट्रीट्स, पीपल लव होंकींग फॉर नो रीज़न एट आल.

क्रिसमस, ईद, दिवाली, सेलिब्रेशन और कूल हिंदी 

वैसे अब तक आपको लग रहा होगा कि किताब बस सामाजिक समस्या और आर्थिक समस्या पर ही केन्द्रित है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. जहाँ एक तरफ किताब में ये सब गंभीर मुद्दे बेहद सहजता से कहे गए हैं वहीँ ये किताब वहाँ की ज़िन्दगी को भी दर्शाती है. वहाँ के त्योहारों और सेलिब्रेशन के रंग भी इस किताब में देखने को मिलते हैं. शिखा दी बताती हैं कि कैसे लन्दन हर संस्कृति को अपना लेता है और बाहें खोल कर उसका स्वगात करता है. वहाँ स्कूल और कम्युनिटीज में जैसे क्रिसमस सेलिब्रेट होती है, वैसे ही दिवाली और ईद भी. शिखा दी आगे बताती हैं कैसे वहाँ हमारे त्यौहार जैसे नवरात्री, गरबा, दिवाली बेहद अच्छे तरह से लोग सेलेब्रिट करते हैं. 

शिखा दी किताब में ये भी बताती हैं कि सिर्फ अलग अलग त्यौहार मानाने में ही नहीं बल्कि अलग भाषा की बात हो तो वहाँ भी लन्दन एक उदार शहर है. वो किताब में कहती हैं, लन्दन में रह रहे लगभग हर बच्चा पूरे अधिकार से इंग्लिश के अलावा कम से कम तीन भाषा तो बोल ही सकता हैं. इससे जायदा डाइवर्सिटी का उदाहरण और क्या हो सकता है.



वैसे इस पूरे किताब में जिस एक बात से मेरे चेहरे पर मुस्कान तैरती रही वो थी हमारी भाषा हिंदी के बारे में कही गयी बात. शिखा दी ने कुछ नयी बात नहीं बताई है, उनके ही ब्लॉग और आलेखों के वजह से मुझे ये बात पहले से पता थी कि लन्दन में हिंदी का बहुत सम्मान होता है, शायद जितना हमारे यहाँ होता है उसे कहीं ज्यादा सम्मान.

हमारे यहाँ हिंदी आम तौर पर उपेक्षित रहती है और हिंदी पढ़ने और बोलने वालों को बड़े ही अजीब नज़रों से देखा जाता है जबकि वहाँ ऐसी बात नहीं है. वहाँ के रेडिओ पर भी हिंदी गाने बजते हैं और वहाँ के बच्चों को भी हिंदी की शिक्षा दी जाती है. हमारे देश में जहाँ हिंदी बोलने और पढ़ने वालों को हीन भाव से देखा जाता है वहीँ लन्दन में बच्चे बड़े ही ख़ूबसूरती से हिंदी बोलते हैं. पूरे यूरोप में हिंदी की प्रतियोगिता होती है और वहाँ के बच्चे पूरे लगन से उसमें शिरकत करते हैं. विदेशी बच्चे भी हिंदी सीखना चाह रहे हैं और हमारे यहाँ के बच्चे इस भाषा से भाग रहे हैं. किताब के जरिये हमें ये भी पता चलता है कि हिंदी टीवी सेरिल्स का लन्दन में भी खूब क्रेज है. इस पूरे किताब पर लन्दन में हिंदी के महत्त्व पर शिखा दी ने करीब तीन चार प्रसंग लिखे हैं जो जो बेहद दिलचस्प हैं और जिसे पढ़ते वक़्त आपके चेहरे पर एक मुकुराहत आ जायेगी.

शिखा दी ने किताब में ये भी बताया है कि लन्दन जहाँ एक समय अपने पुस्तकालयों के लिए मशहूर था वहीं अब बदलते समय की वजह से वहाँ के पुस्तकालय की संख्या में भारी गिरवट आ रही है. उसकी प्रमुख वजह है कि आज के युवा किताबों से दूर जा रहे हैं और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की तरफ तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं. हमारे यहाँ भी वैसे तो पुस्तकालयों का बहुत क्रेज शायद कभी नहीं रहा लेकिन जितने भी पुस्तकालय थें वो सभी एक एक कर के बंद हो रहे हैं और लन्दन की तरह यहाँ भी इसकी वजह बदलता वक्त ही है.

लास्ट-वर्ड्स   

देशी चश्मे से लन्दन डायरी को पढ़ते हुए हम वहाँ के रंगों को महसूस कर सकते हैं. रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी को शिखा दी की नज़रों से देखते हैं और पाते हैं कि वहाँ के ज़िन्दगी में और हमारी ज़िन्दगी में बहुत अंतर न होते हुए भी बहुत से बुनियादी फर्क हैं. जिन बातों का मैंने जिक्र किया है उसके अलावा भी किताब में काफी रोचक टॉपिक्स हैं जिसे पढ़ते हुए हमें वहाँ की जीवन शैली, वहाँ की सामाजिक संरचना के बारे में पता चलता है. हम अक्सर इंग्लैंड, अमेरिका और बाकी विदेशी देशों के ट्रेंड को अपनाने की होड़ में लगे रहते हैं, लेकिन इस किताब में वहाँ की बहुत सी अच्छी आदतों और कायदों का जिक्र है जिससे हमें सीख लेनी चाहिए. शिखा दी की ये किताब आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है और कहीं न कहीं हमें एक सीख भी दे जाती है.

महत्वपूर्ण प्रश्न? कितने की है किताब और कहाँ मिलेगी?

अक्सर जितना आप एक बकवास फिल्म देखने में वीकेंड पर खर्च कर देते हैं, उससे सस्ती किताब है जो बेहद काम की है. दो सौ रुपये दाम हैं. थोड़ी महंगी है, लेकिन हर अच्छी चीज़ सस्ती नहीं मिलती भाईसाहब.

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Saturday, January 12, 2019

कंप्यूटर से दोस्ती की एक सच्ची कहानी

हम आपके हैं कौन फिल्म का एक सीन है, जब निशा(माधुरी दीक्षित) पहली बार अपनी बहन के ससुराल आती है तो रीटा(सहिला चड्डा) उससे पूछती है, तुम क्या पढ़ रही हो? निशा हाथ में क्यू स्टिक पकड़े, पूरे टसन में और ऐटिटूड में जवाब देती है - कंप्यूटर्स!


रीटा चौंक जाती है, "तुम कंप्यूटर्स कर रही हो...वाऊ!", रीटा ऐसे इक्साइटेड हो जाती है जैसे मानो निशा ने कितना बड़ा अचीवमेंट कर लिया हो. वैसे जब ये फिल्म आई थी उन दिनों कंप्यूटर्स पढ़ना सही में एक बड़ी बात थी. हाँ फिल्म अगर आज के परिदृश्य में बनी होती तो संवाद कुछ इस प्रकार होता - 
रीटा - तुम क्या पढ़ रही हो?
निशा - कंप्यूटर्स
रीटा - ठीक है ठीक है!! स्टाइल मारने की जरूरत नहीं. सब लोग यही पढ़ रहे हैं. स्पेसिफिक बताओ...बीसीए? एमसीए? इंजीनियरिंग? डिप्लोमा? या कॉल सेण्टर/बीपीओ के लिए ट्रेनिंग? ह्म्म्म? 

और अब रीटा के आँखों में टसन है. इस सवाल के बाद निशा के चेहरे का एक्सप्रेशन कैसा होगा, इसका अंदाज़ा आप आराम से लगा सकते हैं. 

खैर, मेरी आज की पोस्ट किसी फिल्म के विषय में नहीं है बल्कि इस संवाद में जो विषय है कंप्यूटर्स, उसके बारे में है. पोस्ट लिखते वक़्त फिल्म के संवाद का ये उदाहरण ऐसे ही मजाकिया दिमाग में आ गया, तो लिख दिया.

अब बढ़ते हैं आज की बात की तरफ.

चलिए एक कहानी सुनाता हूँ आपको, मेरी कंप्यूटर से दोस्ती कैसे हुई . सुनने में अजीब लगता है न? कंप्यूटर से दोस्ती? फिर भी सुनिये -  

लोगो प्रोग्रामिंग लैंग्वेज
मैं छठी क्लास में था जब पहली बार कंप्यूटर के संपर्क में आया था. हमारे सिलेबस में कंप्यूटर लैब का एक पीरियड था जिसमें हमें "लोगो प्रोग्रामिंग लैंग्वेज" सिखाया जाता था. उन दिनों का हमारा बचपना कह लीजिये कि हमें ना तो प्रोग्रामिंग लैंग्वेज के महत्त्व का पता था और न कंप्यूटर के महत्त्व का... एक घंटे का कंप्यूटर लैब हमारे लिए फ्री पीरियड होता था, जिसमें खूब मस्ती होती थी. "लोगो" हमारे लिए एक तरह से कंप्यूटर ड्राइंग जैसा था जिसमें कुछ कमांड्स लिख कर तरह-तरह के शेप्स बनाते थे हम. 

उन दिनों विंडो 3.0 चलन में था. मुझे इस बात की जानकारी तो बिलकुल नहीं थी कि विंडो का कौन सा वर्शन नया आया था, लेकिन मुझे विंडो 3.0 के बारे में कुछ-कुछ पता था और एक छठी क्लास के बच्चे के लिए विंडो का नाम जानना ही उस समय बड़ी बात थी. 

मेरे पूरे परिवार में सिर्फ मेरे मंझले मामा कंप्यूटर के जानकार थे. उन्होंने कंप्यूटर का कोर्स कर रखा था और उनके पास कई किताबें थीं जिसमें उनिक्स, लिनक्स, लेट अस सी, और विंडो 3.0 की किताब थीं. सी, उनिक्स और लिनक्स की किताबें मुझे एलियन लगती थीं और उन्हें मैं छूता भी नहीं था, लेकिन विंडो 3.0 की किताब मुझे काफी इंटरेस्टिंग लगती थी. रंगबिरंगे विंडो के स्क्रीनशॉट थे जिसे छठी क्लास का एक बच्चा बड़े आराम से पढ़ और समझ सकता था. जहाँ तक मुझे याद है किताब की भाषा भी बहुत ही सिम्पल अंग्रेजी में थी और धीरे धीरे मैंने वो पूरी किताब पढ़ डाली. मेरे लिए वो किताब एक मैगज़ीन की तरह हो गया था जिसे जब भी मौका मिलता मैं पढ़ डालता. इस किताब के साथ ही साथ मामा के पास कई फ्लॉपी भी मौजूद थे, जो मुख्यतः लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के फ्लॉपी थे. मुझे याद है, मामा के कमरे के सबसे उपरी रैक पर ये किताबें और फ्लॉपी रखे होते थे और जिन्हें मैं टेबल पर चढ़ कर किसी खजाने की तरह उतारता था और समझ में ना आने के बावजूद मैं किताब के पन्ने पलटता रहता था.  

विंडो 3.0 का एक स्क्रीनशॉट. कुछ ऐसा ही स्क्रीनशॉट किताब में रहता था. Image: ComputerHope
मामा की किताब पढ़ने का फायदा मुझे अगले साल ही मिला जब मैं सातवीं क्लास में गया था और जो मेरे कंप्यूटर सीखने की पहली सीढ़ी थी. लैब में जब टीचर हमें विंडो 3.0 के बारे में बताते तो मुझे काफी बातें जानी पहचानी लगती थी. मुझे भी कंप्यूटर सीखने में मन लगने लगा था. लेकिन मेरे कंप्यूटर सीखने में ब्रेक तब लग गया जब आठवीं क्लास में मेरा दाखिला दुसरे स्कूल में हो गया था. ऐसा माना जाता था कि पढ़ाई के मामले में ये नया स्कूल पहले स्कूल से बेहतर था लेकिन कंप्यूटर शिक्षा के मामले में मेरा पहला स्कूल काफी ज्यादा प्रोग्रेसिव था और नए स्कूल में कंप्यूटर शिक्षा को एहमियत नहीं दी जाती थी. वैसे उस समय ज़्यादातर पेरेंट्स भी कंप्यूटर शिक्षा का महत्त्व नहीं जानते थे और उनके लिए ये कोई बहुत बड़ी प्रायोरिटी नहीं थी. 

आठवीं से लेकर दसवीं तक कंप्यूटर शिक्षा ना के बराबर ही रही मेरी. दसवीं का इम्तिहान देने के बाद करीब डेढ़-दो महीनो का वक़्त होता है रिजल्ट आने में, और मैं इस वक़्त का सही इस्तेमाल कर सकूँ, इसके लिए मेरे मँझले मामा ने अपने दोस्त के पास मेरी कंप्यूटर ट्यूइशन रखवा दी. मैं हर सुबह मामा के दोस्त के घर पर जाता था कंप्यूटर सीखने. करीब एक महीने में मैंने ईमेल, वर्ड, पॉवरपॉइंट और भी बहुत कुछ सीखा. बारहवीं में जब गया मैं तो वहाँ भी मेरा ऑप्शनल सब्जेक्ट कंप्यूटर ही था, लेकिन वो बस नाम का था. जितना मैंने डेढ़ महीने में  ट्रेनिंग हासिल की थी, उसका आधा भी हमें स्कूल में नहीं बताया जाता था.

शायद शुरू से कंप्यूटर के हलके संपर्क में रहा था इस वजह से मैंने इंजीनियरिंग में भी कंप्यूटर साइंस ही चुना. इंजीनियरिंग में दाखिला लेने के बाद सबसे पहली जरूरत जो हुई थी वो थी एक डेस्कटॉप की. सही पूछिये तो उस समय बहुत ज्यादा जरूरत नहीं थी डेस्कटॉप खरीदने की, लेकिन एक शौक था कि अब इंजीनियरिंग में आ गए हैं तो एक डेस्कटॉप चाहिए.

हम कर्णाटक के बसव्यकल्याण में थे और वहाँ के लोकल मार्केट में डेस्कटॉप की कीमत बहुत ज्यादा थी. कॉलेज के कुछ सीनियर्स और प्रोफेसर ने राय दी कि हमें कंप्यूटर खरीदने हैदराबाद जाना चाहिए. हम तीन दोस्त थे जिन्हें डेस्कटॉप खरीदना था - मैं आशीष और समित. हम तीनों ने तय किया कि हम हैदराबाद जाकर ही डेस्कटॉप खरीदेंगे.

एटीएम या कार्ड स्वाइप करने की व्यवस्था तो उस वक़्त थी नहीं और लोगों ने बताया कि हैदराबाद कंप्यूटर मार्केट में 'चेक' भी नहीं स्वीकार करते हैं, सिर्फ कैश लेते हैं. ये एक अलग समस्या थी. हम तीनों ने चालीस-चालीस हज़ार रुपये बैंक से निकाले और हैदराबाद के लिए चल दिए.

पूरे रास्ते एक धुकधुकी लगी थी कि करीब सवा लाख रुपये हमारे पास हैं और इतने रुपये के लिए कोई हमारे साथ कुछ भी कर सकता है लेकिन मेरी इस चिंता का निवारण समित के डांट से हुआ. उसनें झिड़कते हुए कहा, तुमनें चलने के पहले लाउडस्पीकर पर अनाउन्स्मेन्ट करवाई थी क्या कि हमारे पास इतने पैसे हैं? अगर नहीं तो चुपचाप चलो, किसी को कुछ पता नहीं चलेगा कि हमारे पास कैश हैं या नहीं.

समित के डांट के बावजूद मन में चिंता तो थी ही. हैदराबाद के पार्क लेन स्थित चेनॉय ट्रेड सेण्टर में पहुँच कर आख़िरकार मैं थोड़ा निश्चिंत हुआ, कि चलो अब मंजिल तक तो पहुँच गए हैं. वहाँ हमारा एक दोस्त मंगलम, जो हैदराबाद का ही निवासी था, पहले से हमारा इंतजार कर रहा था. उसनें एक दूकान रेकमेन्ड किआ हमें जहाँ से हमनें कंप्यूटर खरीदे. कंप्यूटर खरीदते हमें रात हो गयी थी और रात के वक़्त तीनों कंप्यूटर को बसव्यकल्याण ले जाना हमें उचित नहीं लगा. मंगलम के घर पर ही हमनें रात बिताई और अगली सुबह एक जीप भारे पर किया और कॉलेज के लिए निकल गए.

कॉलेज में दोस्तों को हमनें बता रखा था कि हम रात तक वापस आ जायेंगे. मोबाइल तो था नहीं उस समय जो कॉलेज में दोस्तों को खबर करते कि हम रात हैदराबाद में रुक गए हैं. दोस्त भी इतने नालायक कि हमारे न आने पर उन्होंने समझा कि हमें लूट लिया गया है या किडनैप कर लिया गया है इस लिए हम हैदराबाद से वापस नहीं आये और वो बड़े निश्चिंत से हो गए थे. हालाँकि अगली सुबह जब हम पहुँचे तो वो थोड़े हैरान और निराश जरूर हुए होंगे कि हम सही सलामत थे.

हॉस्टल में अपने कमरे में डेस्कटॉप इंस्टाल करने का बाद का मंज़र कमाल का था. सारे लड़के मेरे कमरे में जुट गए थे और डेस्कटॉप के ऑन होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे. मेरे पास कुछ फिल्म के सीडी पहले से मौजूद थे, तो मैंने सबसे पहले एक फिल्म अपने कंप्यूटर पर लगा दी. मेरा छोटा सा कमरा एक विडियो हॉल बन गया था जहाँ लड़के खचाखच भरे थे और फिल्म देख रहे थे. तीन कंप्यूटर हमारे एक हॉस्टल के तीन कमरे में था और सारे लड़के की भीड़ हमेशा इन्हीं तीनों कमरे में रहती थी.

हम तीनों अपने बैच के पहले ऐसे स्टूडेंट थें जिनके पास खुद का डेस्कटॉप था. देखते ही देखते हमारे हॉस्टल के बिल्डिंग के पॉपुलैरिटी बढ़ गयी थी.

इंजीनियरिंग के तीसरे साल की तस्वीर. तब तक ये डेस्कटॉप पुराना हो चुका था. हमारे पास उस वक़्त कैमरा नहीं था इसलिए पहले दो साल की एक भी तस्वीर नहीं है. ये तस्वीर भी एक दोस्त के कैमरा से खींची गयी थी जिसे हमनें एक शाम के लिए उधार लिया था. लेकिन पूरे इंजीनियरिंग ये डेस्कटॉप, टेबल और चेयर मेरी आदत बन चुके थे. 
हैदराबाद के जिस दूकान से हमनें कंप्यूटर खरीदा था, उस दूकान से चलने के पहले दूकान के मालिक के साथ मेरी खूब अच्छी और लम्बी बात हुई थी. उन दिनों हमारे सामाज में सो-कॉल्ड मॉडर्निज़्म नहीं आया था और दूकानदार भी अच्छे कस्टमर्स को याद रखते थे. इसका प्रमाण बस दो तीन महीनों के बाद ही मुझे मिल गया था.

दुर्गा पूजा की छुट्टियों के बाद मैं वापस  कॉलेज लौट रहा था. कॉलेज जाने के लिए हैदराबाद तक ट्रेन से आना पड़ता था और वहाँ से कॉलेज के लिए बस लेनी पड़ती थी. मैंने सोचा अब जब हैदराबाद में हूँ तो उस दूकान के चक्कर लगाता चलूँ, कुछ चीज़ें जो सस्ती मिलेंगी और काम की होंगी उन्हें खरीद भी लिया जाएगा. उस समय तक मैंने उस दूकानदार से जान पहचान बढ़ाने के बारे में सोचा भी नहीं था.

मुझे बेहद आश्चर्य तब हुआ जब दूकान में घुसते ही उस दूकानदार ने मुझे पहचान लिया और बाकायदा डेस्कटॉप की खैरियत पूछने लगा, कि आपका डेस्कटॉप सही तो चल रहा है न. उतने बड़े दूकान का मालिक एक साधारण से कस्टमर को याद रखे ये मेरे लिए हैरान करने वाली बात थी.

मैं वहाँ कुछ ख़ास खरीदारी करने नहीं गया था लेकिन फिर लगने लगा कि अब जब यहाँ आ गया हूँ तो कुछ खरीद ही लूँ. कुछ ब्लांक सीडी, और छोटे मोटे अक्केसोरिएस खरीद कर मैं वहाँ से चला आया.

उसके बाद की कहानी कुछ ऐसी हुई कि मेरे कॉलेज में मेरे बैचमेट के साथ ही साथ मेरे कुछ सीनियर्स जिन्हें भी डेस्कटॉप खरीदना होता, मुझे अपने साथ लेकर हैदराबाद जाते थे और मैं हर बार उन्हें उसी दुकान में ले जाता था. एक साथी को बड़ी हैरानी हुई जब दूकानदार ने हमें चाय और नास्ता करवाया था. उसनें इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि हैदराबाद का कोई कंप्यूटर शोरूम का मालिक मेरी इतनी इज्जत करेगा.

बाद में जब मैंने पहला मोबाइल फोन खरीदा था, तो उस दूकानदार को भी मैंने अपना नंबर दे दिया था. वो भी महीने दो महीने में मुझे कॉल कर के जरूर पूछता था कि कुछ आवश्यकता है या नहीं आपको. अब सोचता हूँ तो लगता है कि ये उस दूकानदार की मार्केटिंग टैक्टिस हो सकती है लेकिन उन दिनों तो इसी बात से ख़ुशी मिलती थी कि कोई आपको एहमियत दे रहा है.

उस दुकान में जब भी जाता था, कुछ न कुछ नया जरूर सीख कर आता था मैं. कोई भी नया आया कंप्यूटर पेरिफरल हो या ऐक्सेसरीज़, वो दूकानदार मुझे बड़े अच्छे से उसके बारे में बताता था.

उस कंप्यूटर शोरूम से खरीदा हुआ डेस्कटॉप ने भी मेरा खूब साथ दिया.अभी जितना कुछ जानता हूँ, उसी डेस्कटॉप ने सिखाना शुरू किया था. और वही डेस्कटॉप था जिसपर मैंने ब्लॉग्गिंग शुरू किया था. इस ब्लॉग को भी उसी कंप्यूटर से मैंने लिखना शुरू किया था. मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में मेरे पहले कंप्यूटर का स्थान सबसे अहम् था.

मेरी छोटी बहन माही और मेरा डेस्कटॉप जिसे इंजीनियरिंग के बाद मैंने घर पर रख दिया था. घर के बच्चे से लेकर बड़ों तक ने इस डेस्कटॉप पर अपना हाथ साफ़ किया है. 
इंजीनियरिंग के बाद जब मैंने अपना पहला लैपटॉप खरीदा, उस डेस्कटॉप को घर पर रख आया था. घर पर भी बहन, पापा और माँ ने भी उसका खूब इस्तेमाल किया. मैं जब भी घर वापस जाता तो अपने उस कंप्यूटर को झाड़-पोछ कर उसी पर काम करता था. वो डेस्कटॉप मेरे घर में एक सदस्य की तरह रह रहा था.

लेकिन जैसा अक्सर होता है, मशीन आख़िरकार एक मशीन ही हैं. उसमें भी धीरे-धीरे खराबी आने लगी थी और आख़िरकार हम सब ने उसे बेचने का कड़ा फैसला  लिया.

आखिर के दिनों में उस डेस्कटॉप का कोई भी इस्तेमाल नहीं करता था. वो बस एक कोने में पड़ा रहता था, लेकिन जिस दिन डेस्कटॉप को बेचा अचानक से घर का वो कोना बड़ा खाली खाली सा लगने लगा. धीरे धीरे उस डेस्कटॉप को हम भूल भी गए. 

इधर कुछ दिनों से मुझे काम के सिलसिले में एक लैपटॉप के अलावा एक और कंप्यूटर की आवश्यकता थी. तय किया कि लैपटॉप के बजाये इस बार एक डेस्कटॉप लिया जाएगा. बजट में भी फिट आएगा और काम भी ज्यादा हो सकेगा उससे.

नया डेस्कटॉप 
परसों दिल्ली के नेहरु प्लेस मार्केट से जाकर मैंने एक नया डेस्कटॉप खरीद लिया. मजेदार बात ये हुई कि उसे खरीदते वक़्त पुरानी बातें, हैदराबाद और बासवकल्याण के दिन याद आ रहे थे जिनका मेरे इस डेस्कटॉप से कोई मतलब नहीं था, लेकिन जाने क्यों मैं नेहरु प्लेस और चेनॉय ट्रेड सेण्टर को रिलेट करने लगा था. घर में जब टेबल पर इस डेस्कटॉप को मैंने असेम्बल किया तो लगा जैसे मेरा वही पुराना साथी एक नया अवतार लेकर वापस घर में आया है....

Thursday, December 13, 2018

एक ऐड्वर्टाइज़्मन्ट जिसनें दिलों पर तबाही मचा रखी है

पिछले एक महीने से अधिकतर लोग टीवी में न्यूज़ चैनल में इलेक्शन को लेकर अटके पड़े थे, तो वहीं कुछ लोग ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान से मिले सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे थे और इन सब के बीच एक पुराने बिस्किट कंपनी ने हमारे नाक के नीचे कुछ ऐसा कर दिया कि जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. एक के बाद एक हमारे मन पर इस कंपनी ने कुछ ऐसे टेररिस्ट हमले किये कि उससे उबर पाना आसान बात नहीं थी.

बात है पिछले महीने के आखिरी कुछ दिनों की. जहाँ तक मुझे याद है, वीकेंड रहा होगा. शायद शनिवार का दिन था. मैं रात में लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था, हाथ में कॉफ़ी का कप था, और सामने टीवी चल रहा था. कानों में एक ऐड्वर्टाइज़्मन्ट की आवाज़ आई, कोई लड़की अपनी माँ से सवाल कर रही थी, 'अम्मा ये क्या है? हारमोनियम है?'

मैंने टीवी की ओर देखा. एक बच्ची के हाथों में एक यंत्र था और उसी यंत्र से जुड़े सवाल वो लड़की अपनी माँ से पूछ रही थी. सच कहूँ तो पहली झलक में मैंने उस ऐड्वर्टाइज़्मन्ट के ऊपर ध्यान ही नहीं दिया था और मेरी  नज़रें वापस लैपटॉप पर पड़ने ही वाली थी कि उस लड़की की माँ का जवाब सुनाई दिया, 'हमारे ज़माने का म्यूजिक प्लेयर'. 

मेरे कान खड़े हो गए. मेरी नज़रें फिर से टीवी पर गड़ गयीं...

अरे!! ये तो वाकमैन के बारे में ऐड्वर्टाइज़्मन्ट है....

दो पल के लिए तो, हार्ट स्किपड अ बिट... 

इस परले जी कि तो.....

खैर, ऐड्वर्टाइज़्मन्ट मात्र पैतीस सेकण्ड का था, और वो खत्म भी हो चूका था. मैंने झट से अपना लैपटॉप उठाया, यूट्यूब पर इस ऐड्वर्टाइज़्मन्ट को सर्च किया और दो-तीन-चार-पाँच बार लूप में ये ऐड्वर्टाइज़्मन्ट को देखने लगा.

बात थी ही कुछ ऐसी... ये ऐड्वर्टाइज़्मन्ट मेरे खोये हुए पुराने एक दोस्त के बारे में था. मेरे खोये हुए वाकमैन के बारे में था...

बड़ा तेज़ गुस्सा आया था परले जी पर? याद हद है...अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए क्या कोई ऐसी वाहियात हरकत करता है क्या? मेरे जैसे लोगों का इसे ज़रा भी ख्याल नहीं आया? जानते तो होंगे ये कि कुछ लोगों पर ऐसे ऐड्वर्टाइज़्मन्ट का क्या असर होता है. ज़मानियत में उलझे कड़े हृदय वाले लोगों पर तो कोई असर नहीं होता लेकिन जो डेलिकेट हार्ट वाले हैं वो? उनका क्या?

मतलब पर्मिशन कैसे मिल जाती हैं इन बड़ी कम्पनियों को ऐसे खतरनाक टेररिस्ट हमले करने की जिसमें दिल-ओ-जान बुरी तरह घायल हो जाते हैं.

खैर, रात का वक़्त था, तो मैं कुछ ज्यादा कर भी नहीं सकता था. सोने गया लेकिन आँखों में नींद कहाँ थी?

बार बार वही एक चेहरा, फिलिप्स का अपना सिल्वर कलर का वो वकमैन. उसी कि शक्ल बार बार आँखों के सामने घूम रही थी. पॉकेट मनी बचा कर जिसे खरीदा था. इंजीनियरिंग के दिनों का अपना वो साथी था...

ये जो पुराने प्यार की यादें होती हैं न वो बड़ी बद्तामीज़ होती हैं.उन्हें तो बस बहाना चाहिए होता है आ धमकने का और फिर वो वापस नहीं जाती.

वाकमैन की भी बातें कुछ ऐसी ही रह रह कर याद आने लगी थी. लग रहा था जैसे मानो उसनें आकर चारो तरफ से मुझे जकड़ लिया है, "बच्चू, इतनी आसानी से कैसे पीछा छुड़ाओगे मुझसे? ज़माने बाद पकड़ में आये हो. कंप्यूटर और मोबाइल के चक्कर में तुमनें मुझसे ब्रेक अप कर लिया था न, मुझे अकेला छोड़ दिया था और घर के पुराने सामानों के बीच ठूंस दिया था तुमनें. सुना होगा न तुमने कि दुनिया में कुछ निर्दयी कातिल ऐसे होते हैं जो लोगों को जिंदा कब्र में दफना देते हैं. और वो जिंदा लोग जिनमें धड़कन बाकी होती हैं, जीने की चाह होती है, वो कब्र में ही घुट-घुट कर मर जाते हैं. ठीक वैसे ही तुमने मुझे छोड़ दिया था घर के पुराने सामानों के कब्रगाह में मरने के लिए. हाँ, तुमनें एक दो साल बाद मेरी सुध लेनी चाही थी लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अस्पताल भी लेकर गए थे तब तुम मुझे. डॉक्टर्स ने कहा था कि इसमें जान फिर से डाली जा सकती है. रकम जो उन्होंने बताई थी, वो भी तुम आसानी से अफोर्ड कर सकते थे लेकिन तुमनें मुझे फिर से जिंदा करने में जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई, और अब मुझे याद कर रहे हो..बेशर्म कहीं के...

मैंने घड़ी की ओर देखा, रात के ढाई बज रहे थे, लेकिन इस कमबख्त वाकमैन की यादों ने इतने बेरहमी से शिकंजा मुझपर कसा था कि मैं कुछ भी कर पाने में असमर्थ था. इसके सवालों का जवाब तो वैसे भी नहीं था मेरे पास, बस कितनी ही बातें इसकी एक के बाद एक याद आने लग रही थी...

पॉकेट मनी बचा कर इसे खरीदा था. बैटरी में पैसे खूब जाते थे और बैटरी में हर बार इन्वेस्ट करने से बचने के लिए मैंने पॉकेट मनी फिर से बचाए थे और एक रीचार्जबल बैटरी और उसका चार्जर भी खरीदा था. स्टाइल मारने के लिए अक्सर अपने जीन्स के ऊपर इसे खोंस(अटका) दिया करते थे और फिर कानों में हेडफोन लगाये, आँखों में गोगल्स डाले सड़कों पर घूमते थे.

वो दिन सच में सुनहरे दिन थे. लेकिन जैसे जैसे कैसेट खरीदना कम हुआ, लैपटॉप और मोबाइल का वर्चस्व बढ़ता चला गया, अपने इस दोस्त को मैं भी भूलता चला गया और अब एक मामूली से ऐड्वर्टाइज़्मन्ट ने जैसे फिर से सब कुछ याद दिला दिया था.



वैसे, ये जो बकवास मैंने यहाँ अभी उड़ेली है, वो बेमतलब भी नहीं है. पार्ले जी का पैतीस मिनट का ये ऐड्वर्टाइज़्मन्ट सच में इतना प्यारा है कि अगर आपने भी कभी अपने वाकमैन से मोहब्बत की होगी तो ये ऐड्वर्टाइज़्मन्ट जरूर बेहद पसंद आएगा आपको.

विज्ञापन देखते हुए ये ख्याल भी आया कि सच में अगर मैंने अपना पुराना वाकमैन को कबाड़ी में न निकाल दिया होता तो आज कम से कम पुराने दिनों की यादों की खातिर उसमें गाने सुने जा सकते थे.

खैर, आप तो ये विज्ञापन देखिये -



Thursday, November 1, 2018

भूला फ़साना कोई, गुज़रा ज़माना कोई..

संगीत में बड़ी शक्ति होती है, ये बात सभी जानते हैं और मानते भी हैं. लेकिन कभी कभी हम इस बात को भूल से जाते हैं. संगीत लेकिन अपनी  इस ताकत को अक्सर हम पर जाहिर कर दिया करता है. वो ये जताते देर नहीं लगाता कि वो चाहे तो आपको दिल्ली के कनॉट प्लेस के किसी कैफे से एक पल में ट्रांसपोर्ट कर के राजबंशी नगर के क्वार्टर संख्या एक सौ तिरानबे बटा चार सौ में ला के पटक सकती है.

टाइम ट्रेवल की मशीन अभी ईजाद नहीं हुई, लेकिन संगीत ने अनगिनत बार ये साबित किया है कि वो जब चाहे आपको टाइम ट्रेवल करवा सकता है.

आपको कभी न कभी तो ऐसा लगा होगा न कि आप सड़कों पर चल रहे हैं, मोबाइल में कोई पुराना गीत सुन रहे हैं और अचानक जैसे सब कुछ ठहर सा गया हो. वक़्त थम सा गया हो, ठंडी हवाएं बहने लगी हों और कोई पुरानी बात याद करते हुए आपके होठों पर  यूँ ही एक मुस्कान चली आई हो. है न? होता है न ऐसा?

क्या कहा? नहीं होता क्या ये आपके साथ?

क्या आज मेरी ये बातें अजीब लग रही हैं आपको?

कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे हैं कि मैं इतने दिनों बाद वापस ब्लॉग लिख रहा हूँ और ये कैसी बहकी बहकी सी बातें करने लगा?

घबराइये नहीं. मुझे खुद भी आज अपनी बातें और अपनी चाल भी कुछ अजीब लग रही हैं. ग़ालिब का वो शेर है न “बक रहा हूँ जुनूँ में क्या क्या... कुछ कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई ”, वैसी ही फीलिंग आ रही है मुझे. लेकिन वो कहते हैं न कि बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब..कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है... मेरे साथ भी कुछ ऐसी बात हुई है आज.

वैसे मेरे केस में पर्दादारी तो कुछ नहीं है, लेकिन हाँ आज इस बेखुदी का कुछ सबब जरूर है. दरअसल मेरी इस बेखुदी का सबब बड़ी ही मामूली सी एक बात है -

आप में से शायद बहुत लोगों को ये बात पता नहीं हो तो मैं बता देता हूँ कि संगीत की ही तरह एक और ऐसी शय है जो आपको आपके बीते दिनों में ले जा सकती है.

जी नहीं हुज़ूर, मैं किताबों की या आपके किसी निजी डायरी की बातें नहीं कर रहा हूँ. मैं तो आपके चहेते फेसबुक का एक फीचर जो दुनिया में “ऑन दिस डे” के नाम से मशहूर है, उसकी बातें कर रहा हूँ.

हुआ कुछ यूँ कि आज दोपहर मैं कुछ इत्मिनान से बैठा था. एक अरसे के बाद आज की दोपहर ऐसी थी कि मैं बिलकुल खाली सा था. न काम की कोई फ़िक्र न किसी बात की कोई चिंता. मुझे याद आया कि एक जमाने से मैंने फेसबुक के ऑन दिस डे पर नज़र नहीं डाली है, वरना पहले तो कुछ ऐसा होता था कि फेसबुक लॉग इन के बाद सीधा ऑन दिस डे के तरफ ही रुख करता था.

आज ‘ऑन दिस डे’ अर्थात फेसबुक के मिनी टाइममशीन को खोलने के बाद फेसबुक ने कुछ दस बारह बातें याद दिला दी, जिनमें कुछ तस्वीरें भी थी, दोस्तों के कुछ मेसेज और एक दस साल पुराना पोस्ट किया हुआ स्टेट्स था, जिससे मुझे याद आया कि आज से दस साल पहले, जब मेरे मात्र बीस या तीस दोस्त ही फेसबुक पर थे, मैं 24x7 ऑनलाइन रहता था. मतलब उस ज़माने में मैं चौबीस घंटे ऑनलाइन रहता था जब दुनिया एंड्राइड नामक बीमारी से ग्रसित नहीं हुई थी और जब किसी तरह के किसी एप का अस्तित्व दुनिया में नहीं था.

उस स्टेट्स पर आये कमेन्ट से मुझे ये भी याद आया कि उन दिनों संगीत से मेरा बड़ा जबरदस्त कनेक्शन  था. संगीत से तो कनेक्शन अभी भी है, ये एक ऐसा रोग है जो मरते दम तक आपके शरीर से चिपका रहता है. लेकिन उन दिनों मेरा म्यूजिक क्रेज अपने चरम पर था. मुझे याद नहीं आता कि बैंगलोर में मेरा कमरा कभी शांत रहा हो. रात को सोते वक़्त भी मेरे लैपटॉप के प्लेलिस्ट पर ग़ज़लें या पुराने गीत लगे होते थे, और वो बंद तभी किये जाते थे जब मैं कमरे से बाहर निकल रहा होता था.

वहीं अब वक़्त ऐसा आ गया है कि मुझे ये भी ध्यान भी नहीं आता कि अपने शौक के लिए मैंने आखिरी बार गाने कब सुने हैं. प्रोफेशनली तो हर रोज़ नए गाने सुनने के लिए कानों को सजा-सी  देता हूँ, लेकिन खुद के लिए गाने सुने हुए सच में अरसा हो गया.

मैंने झट से अपना मोबाइल निकाला, और इस उद्देश्य से कि आज ऑफिस से घर लौटते वक़्त जी भर गाने सुनूँगा, मैंने बैग से हेडफोन निकाला, हैडफ़ोन के एक सिरे को मोबाइल में और दूसरे सिरे को कानों में ठूंस के बड़े इक्साइट्मेंट से गाना सुनने के लिए प्ले-लिस्ट ओपन किया.

बाय डिफ़ॉल्ट कुछ ऑडियो फाइल प्लेलिस्ट में थे जो मेरे काम से जुड़े थे. मैंने आल फोल्डर की तरफ रुख किया, लेकिन सिर्फ एक ही फोल्डर था मोबाइल में जिसे मैंने वर्क रिलेटेड पॉडकास्ट के नाम से सेव कर रखा था.

मेरे गाने कहाँ गए? मेरे प्ले लिस्ट में मेरे सिलेक्टेड एक भी गाने नहीं थे. सब गायब थे... 
मैं हड़बड़ी में अपने मोबाइल के हर फोल्डर को चेक करने लगा. म्यूजिक का फोल्डर खाली था, मीडिया का फोल्डर खाली था और यहाँ तक कि विडियो का फोल्डर भी खाली था.

मैं हैरान सा हो गया.. सारे गाने कहाँ गए मेरे? मैं सोचने लगा...

मुझे याद आया कि ये मेरा नया फोन है जिसे मैंने करीब तीन महीने पहले खरीदा था, और तब से अब तक मैंने इसमें कोई गाने डाले ही नहीं है.

रियली? आई मीन कैसे पॉसिबल है ये? 

कसम से कह रहा हूँ, सर शर्म से झुक गया मेरा...

“एक भी गाने, ग़ज़लें नहीं हैं तेरे फ़ोन में? क्या कर रहा है भाई? ऐसे ज़िन्दगी चलती है क्या?”, मैंने खुद को डांटते हुए कहा और फिर निराश होकर मोबाइल को टेबल पर पटक दिया.

यकायक ध्यान आया, यार ये वो अँधा युग नहीं है जब एक एक गाने को डाउनलोड करने के लिए या म्यूजिक को स्ट्रीम करने से पहले दस बार सोचना पड़ता था. रिलायंस जिओ की कृपा देश पर खूब जोर से बरसी है और सभी मोबाइल ऑपरेटर के साथ साथ मेरा ऑपरेटर एयरटेल भी अपने औकात पर आ गया है, अब म्यूजिक क्या  मोबाइल पर फिल्म भी स्ट्रीम  कर सकते हैं...

इक्साइट्मेंट फिर से वापस लौट आई...

मैंने झट से मोबाइल उठाया और एक म्यूजिक एप डाउनलोड किया और उसके होमपेज पर ही एक बना बनाया प्लेलिस्ट दिख गया, ‘द गोल्डन निनेटी’. 

बस फिर क्या था, मैंने झट से उस प्लेलिस्ट के सारे गाने डाउनलोड कर लिए. थोड़ा आश्चर्य भी हुआ, कि इस एप को कैसे पता मैं नब्बे के दशक के गाने सुनना चाह रहा था अभी?

‘यार, तुम क्या मन की बातें भी पढ़ लिया करते हो?’, मैंने उस म्यूजिक एप से पूछा, लेकिन वो बस मुस्कुरा कर रह गया.

खैर, उस प्लेलिस्ट में जो सबसे ज्यादा गाने थे वो कुछ साल पुरानी एक स्वीट सी फिल्म “रहना है तेरे दिल में” फिल्म से थे. मैंने उस प्लेलिस्ट के सभी गाने के एल्बम को डाउनलोड कर लिया.

यहाँ तक तो सीधी सी बात है, लेकिन इसके बाद जो हुआ वो मेरे लिए एक चमत्कार से कम नहीं था. गाने डाउनलोड करने के बाद कुछ ऐसा हुआ जिसकी मैंने कल्पना नहीं की थी.

कानों में उस प्लेलिस्ट के पहले गाने जो Track1 के नाम से सेव था उसके बोल आये...

“सोनी ओ सोनी सोनी, मेरी मनमोहनी सोनी / सुन गल मेरी सुन, मैं हूँ मुश्किल में / रहना है तेरे दिल में.. रहना है तेरे दिल में.." 

मैं आँख बंद कर के गाने सुन रहा था और इस गाने के ये बोल कानों में पड़ते ही मेरी आँख एकदम से खुल गयी ----

हाउ इस  इट पॉसिबल? 

ये गाना? ये गाना कैसे मिल गया इस एप को? ये गाना जिसके बारे में इसके फिल्ममेकर भी भूल गए हैं, वो इस म्यूजिक एप के हाथ कैसे लग गया?

ज़माने बाद मैंने इस गाने के बोल सुने थे और मुझे अभी तक यकीन नहीं हो रहा था कि मैं सच में इस गाने को सुन रहा हूँ?

आई मीन इज दिस फॉर रियल?

हैंग ऑन!! 
हैंग ऑन!! 

इससे पहले कि आप कन्फ्यूज होकर, मेरे ब्लॉग से लौट जाए, पूरी बात बता रहा हूँ -- 

बात पुरानी है, बहुत ज्यादा पुरानी भी नहीं, मेरे इंटर के दिनों की बातें हैं.

जब इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहा था. ‘रहना है तेरे दिल में' फिल्म आने वाली थी. उन दिनों किसी ने भी इस फिल्म का नाम नहीं सुना था ना ही किसी को इस फिल्म के बारे में थोड़ी भी जानकारी थी, लेकिन इसके गाने सभी के ज़ुबान पर चढ़े हुए थे. फिल्म के ऑफिसियल म्यूजिक अल्बम लांच के पहले फिल्ममेकर ने म्यूजिक को प्रोमोट करने का एक नायब तरीका ढूँढा था.

फिल्म का ऑफिसियल अल्बम रिलीज़ करने के पहले फिल्ममेकर ने एक मिनी एल्बम रिलीज किया था जिसमें सिर्फ चार गाने थे. ‘रहना है तेरे दिल में’ के चार टाइटल ट्रैक. प्रोडूसर ने एक पब्लिक वोटिंग करवाई थी, कि ये चारो टाइटल ट्रैक में से उस गाने को फिल्म के ऑफिसियल एल्बम में रखा जाएगा जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे. उन दिनों छैयां छैयां के वजह से सुखविंदर का मैं फैन था, और चाह रहा था कि सुखविंदर का गाया ये गाना 'सोनी सोनी.' फिल्म के टाइटल ट्रैक में रखा जाए, लेकिन इस गाने को ऑफिसियल एल्बम में जगह नहीं मिली थी.

आज मुद्दत बात मुझे ये गाना सुनने को मिला. मेरे लिए ये किसी आश्चर्य से कम नहीं था, क्यूंकि कुछ साल पहले तक मैंने इन चार गाने के लिए इन्टरनेट का कोना कोना खंगाल डाला था, लेकिन इन चार गानों का नाम-ओ-निशाँ नहीं मिला मुझे और आज इतने ज़माने बाद मैं इन गानों को सुन रहा हूँ. इस बात से सच में मेरा पूरा दिन बन गया था आज.

वैसे सच कहूँ तो ये कोई बहुत बेहतरीन गाना नहीं है, बहुत ही औसत दर्जे का गाना है, लेकिन साहब कभी कभी ऐसा होता है ज़िन्दगी में कि बहुत ही मामूली चीज़ें आपके दिल के बेहद करीब होती हैं और उनकी कोई वजह नहीं होती. बेवजह ही कमाल की बातें होती रहती हैं ज़िन्दगी में.. 

मैं जानता हूँ, ये सब पढ़ने के बाद आप अभी ये भी सोच रहे होंगे कि यार, खामखां इसने इतनी लम्बी  कहानी बना दी,  Its not a big deal!, बिना मतलब ये लड़का Carried Away हुआ जा रहा है और क्या क्या बके जा रहा है, इसे खुद भी नहीं पता...

तो हुज़ूर ये बातें बिलकुल सही है. कभी कभी ज़िन्दगी में बेहद मामूली और गैर जरूरी बातों के लिए Carried Away हो जाने में भी अपना अलग ही मज़ा है. है न?

वैसे सही बताऊँ तो इस गाने ने मुझे कुछ बेहद अनमोल पल याद दिला दिए मुझे. अपने छोटे से सरकारी क्वार्टर का वो मकान, वहां की शाम, वहां का बगीचा और जाने क्या क्या.

उन दिनों हमारे क्वार्टर का मेन गेट टूटा हुआ था तो हमने काम चलाऊ लकड़ी का गेट लगा दिया था.. बहुत दिनों तक वो लकड़ी का गेट ही हमारा मुख्य गेट था. बाद में जाकर वहाँ लोहे का गेट लगा था. अभी ये गाना सुनते हुए मुझे अपने घर का वो लकड़ी का गेट भी जाने क्यों याद आ रहा है.

देखिये साहब, म्यूजिक की एक बड़ी ख़राब आदत होती है. वो सिर्फ एक तय समय में आपको ला के नहीं फेंकती. अगर बेहरहमी पर उतर आये तो वो किक मार के आपको और पीछे के तारीख में भेज दिया करती है. इस फिल्म के उस चार गाने ने वही काम किया आज. पहले तो मुझे Late Nineties के दौर में ला कर फेंक दिया इन्होने और उसके बाद एक ज़ोरदार किक मार के सीधे Mid-Nineties में लाकर फेंक दिया मुझे. एक एक छोटी छोटी बातें, स्कूल के दिन, शाम में कोचिंग के लिए जो मास्टर साहब आते थे वो वक़्त, और न जाने कैसी कैसी कमाल की बातें याद आने लगी..सच कहूँ तो यादों का तो जैसे सैलाब सा आ गया था.

खैर,
हम कर भी क्या सकते हैं... ये यादें होती ही हैं ऐसी बेरहम. बे-वक़्त आ जाया करती हैं और आ के अक्सर ऐसा सैलाब उठा जाती हैं, कि हम बस उसमें बहे चले जाते हैं..

लेकिन आप इस बात से ज़रा भी नहीं घबराइए..यादों को मैं कण्ट्रोल कर के यहीं पर समेट लेता हूँ, वरना आप दोबारा इस ब्लॉग का रुख नहीं करेंगे. वैसे भी एक दिन में ज्यादा झटके नहीं खाने चाहिए. है न?

बाकी बातें फिर कभी...

फ़िलहाल,
आप चाहे तो इस गाने को, जिसने आज ये सब कांड करवाया है, उसे यहाँ सुन सकते हैं...