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Wednesday, March 23, 2011

शहीद भगत सिंह का अंतिम पत्र और कुछ तस्वीरें

(एक पुराने पोस्ट को रीपोस्ट कर रहा हूँ, साथ में एक कविता और कुछ तस्वीरें भी)


आज 23 मार्च है.आज ही के दिन भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश सरकार ने फांसी कि सजा सुनाई थी.आज इन तीनो कि शहादत का दिन है.मुझे मालूम नहीं कितने लोगों को आज का ये दिन याद है.लेकिन हमें इस दिन को कभी भूलना नहीं चाहिए.

ये एक अजीब बात है कि हमारे देश के मीडिया/अखबार वाले भी भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु के बारे में कुछ भी बातें नहीं कर रहे...कोई विशेष समाचार नहीं दिखा रहे.ऐसे तो कई मसालेदार खबर मीडिया वाले हर रोज़ दिखाते रहते हैं.शायद हमारे मीडिया वाले लोगों को याद भी नहीं कि आज के दिन कि महत्वता क्या है. मैं मीडिया के खिलाफ नहीं हूँ लेकिन उन्हें आज के दिन भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु को याद करना चाहिए.आज के जेनरेसन के बच्चों में बहुत कम लोग ही उनके बारे में अच्छे से जानते हैं..और फिर भी अगर मिडिया या फिर हम लोग उन्हें याद न करें तो कहीं भगत सिंह और उनके साथियों का नाम कहीं गुम न हो जाए...मेरे लिए,और भी कई लोगों के लिए भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरु हमेशा एक आदर्श रहे हैं और रहेंगे.

भगत सिंह, ने अपने अंतिम पत्र में ये लिखा...

22 मार्च,1931 

साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता. लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता.

मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता.

आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.

हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी  पूरा नहीं कर सका. अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता.

इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया. मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है. अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है. कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए.

आपका साथी,
भगत सिंह


उनकी लिखी एक कविता भी पढ़िए - 


उसे यह फ़िक्र है हरदम, 
नया तर्जे-जफ़ा क्या है? 


हमें यह शौक देखें, 
सितम की इंतहा क्या है? 


दहर से क्यों खफ़ा रहे, 
चर्ख का क्यों गिला करें, 


सारा जहाँ अदू सही, 
आओ मुकाबला करें। 


कोई दम का मेहमान हूँ, 
ए-अहले-महफ़िल, 


चरागे सहर हूँ, 
बुझा चाहता हूँ। 


मेरी हवाओं में रहेगी, 
ख़यालों की बिजली, 


यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी, 
रहे रहे न रहे। 


           - मार्च १९३१


कुछ बेशकीमती तस्वीरें - 

भगत सिंह की पॉकेट घड़ी 

उनके जूते 

ये पोस्टर नेशनल आर्ट प्रेस लाहोर द्वारा निकाला गया था और पुरे पंजाब में बांटा गया था...

जेल की तस्वीर 

भगत सिंह की कमीज 

ये है सुखदेव की टोपी, जिसे उन्होंने हमेशा पहना 


भगत सिंह के बाकी पत्र  
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