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Friday, March 23, 2012

कष्टों से भागना कायरता है - भगत सिंह

भगत सिंह और सुखदेव दोनों को ही फांसी की सजा का हुक्म हो चूका था.देश में फांसी की सजा के विरुद्ध क्रोध उफान उठा था.सुखदेव के मन में आया की हमारी फांसी रुक जायेगी और हमें आजन्म कारावास का दंड भोगना पड़ेगा.14वर्ष काले पानी में रहकर हम निर्जीव हो जायेंगे.इस स्थिति में जीने से अच्छा है की मैं आत्महत्या कर लूँ.उन्होंने अपना विचार भगत सिंह को लिख भेजा.उसके उत्तर में भगत सिंह ने यह पत्र लिखा :

प्रिय भाई

मैंने आपके पत्र को कई बार ध्यानपूर्वक पढ़ा.मैं अनुभव करता हूँ की बदली हुई परिस्थितियों ने हम पर अलग अलग प्रभाव डाला है.जिन बातों से जेल के बाहर मैं घृणा करते थे, वे आपके लिए अब अनिवार्य हो चुकी है.इसी प्रकार मैं जेल से बहार जिन बातों का विशेष रूप से समर्थन करता था, वे अब मेरे लिए विशेष महत्त्व नहीं रखतीं.उदाहरणरर्थ, मैं व्यग्तिगत प्रेम का विशेष रूप से मानने वाला था, परन्तु अब इस भावना का मेरे ह्रदय एवं मस्तिष्क में कोई विशेष स्थान नहीं रहा.बाहर आप इसके कड़े विरोधी थे, परन्तु इस सम्बन्ध में अब आपके विचारों में भारी परिवर्तन एवं क्रान्ति आ चुकी है.आप इसे मानव जीवन का एक अत्यंत आवश्यक एवं अनिवार्य अंग अनुभव करते हैं.

आपको याद होगा की एक दिन मैंने आत्महत्या के विषय पर आपसे चर्चा की थी, तब मैंने आपको बताया था, कई परिस्थितियों  में आत्महत्या उचित हो सकती है,परन्तु आपने मेरे इस दृष्टिकोण का विरोध किया था.मेरे इस विषय में अब वही राय है जो पहले आपकी थी, अर्थात आत्महत्या एक घृणित अपराध है.यह पूर्णतः कायरता का कार्य है.

आप कहते हैं की आप यह नहीं समझ सके की केवल कष्ट सहन करने से आप अपने देश की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं.आप जैसे व्यक्ति की ओर से ऐसा प्रश्न करना बड़े आश्चर्य की बात है, क्यूंकि नौजवान भारत सभा के ध्येय 'सेवा द्वारा कष्टों को सहन करना एवं बलिदान करना' को हमने सोच-समझकर कितना प्यार किया था.मैं यह समझता हूँ की आपने अधिक से अधिक संभव सेवा की.अब यह समय है की जो कुछ आपने किया,उसके लिए कष्ट उठायें.दूसरी बात यह है की यही वह अवसर है, जब आपको सम्पूर्ण जनता का नेतृत्व करना है.

मानव किसी भी कार्य को उचित मानकर ही करता है, जैसे की हमने लेजिस्लेटिव असेम्बली में बम फेंकने का कार्य किया था.कार्य करने के पश्चात उसका परिणाम और उसका फल भोगने की बारी आती है.क्या आपका यह विचार है की यदि हमने दया के लिए गिडगिडाते हुए दंड से बचने का प्रत्यन किया होता तो हमारा यह कार्य उचित होता?नहीं, इसका प्रभाव लोगों पर उल्टा होता.अब हम अपने लक्ष्य में पूर्णतया सफल हुए हैं.

बंदी होने के समय हमारी संस्था के राजनैतिक बंदियों की दशा अत्यंत दयनीय थी.हमने उसे सुधारने का प्रयास प्रारंभ कर दिया.मैं आपको पूरी गंभीरता से बताता हूँ की हमे यह विश्वास था की हम बहुत कम समय के भीतर ही मर जायेंगे.हमें उपवास की स्थिति में कृत्रिम रीति से भोजन दिए जाने का न तो ज्ञान ही था, न हमें यह विचार सूझता ही था.हम तो मृत्यु के लिए तैयार थे.क्या आपका यह अभिप्राय है की हम आत्महत्या करना चाहते थे?नहीं, प्रत्यनशील होना एवं श्रेष्ठ और उत्कृष्ट आदर्श के लिए जीवन दे देना कदापि आत्महत्या नहीं कही जा सकती.हमारे मित्र(श्री यतीन्द्रनाथ दास) की मृत्यु को स्मरणीय है.क्या आप इसे आत्महत्या कहेंगे?हमारा कष्टों को सहना फल लाया.समस्त देश में एक विराट और सर्वव्यापी आंदोलन प्रारंभ हो गया.हम अपने लक्ष्य में सफल हुए.इस प्रकार के संघर्ष में मारना एक आदर्श मृत्यु है.

आपको यह स्मरण होगा की अनेक बार इस विषय पर हमने बातचीत की है की रुसी साहित्य में जो वास्तविकता प्रत्येक स्थान पर मिलती है,वह हमारे साहित्य में कदापि नहीं दिखाई देती.हम उनकी कहानियों में कष्टों और दुखदाई स्थितियों को बहुत पसंद करते हैं,परन्तु कष्ट-सहन की उस भावना को अपने अंदर अनुभव नहीं करते.हम उनके उन्माद और उनके चरित्र की असाधारण ऊँचाइयों के प्रशंशक हैं, परन्तु इसके कारणों पर सोच-विचार करने की कभी चिंता नहीं करते.मैं कहूँगा की केवल आपत्तियां सहन करने के उल्लेख ने ही उन कहानियों में सहायता,दर्द की गहरी टीस और उनके चरित्र तथा साहित्य में ऊँचाई उत्पन्न की है.हमारी दशा उस समय दयनीय और हास्यास्पद हो जाती है जब हम अपने जीवन में रहस्यवाद को अकारण ही प्रविष्ट कर लेते हैं, यधपि इसके लिए कोई प्राकृतिक या ठोस आधार नहीं होता,हमारे जैसे व्यक्तियों को, जो प्रत्येक दृष्टि से क्रांतिकारी होने का गर्व करते हैं,सदैव हर प्रकार से उन आपत्तियों,चिंताओं,दुखों और कष्टों को सहन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए, जिनको हम स्वयं आरम्भ किये संघर्ष के द्वारा ही आमंत्रित करते हैं,एवं जिनके कारण हम अपने आपको क्रांतिकारी समझते हैं.

मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ की जेल में और केवल जेलों में ही कोई व्यक्ति अपराध एवं पाप जैसे महँ सामजिक विषय का प्रत्यक्ष अध्यन्न करने का अवसर प्राप्त कर सकता है.मैंने इस विषय का कुछ साहित्य पढ़ा है और जेल ही ऐसे विषयों का स्वाध्याय करने का सबसे अधिक उपयुक्त स्थान है.स्वाध्याय का सर्वश्रेष्ठ भाग है :स्वयं कष्टों को सहना.

आप भली प्रकार जानते हैं की रूस में राजनैतिक बंदियों का बंदीगृहों में आपत्तियां सहन करना ही जारशाही का तख्ता उलटने के पश्चात उनके द्वारा जेलों के प्रबंध में क्रान्ति लाये जाने का सबसे बड़ा कारण था.क्या भारत को ऐसे व्यक्तियों की आवशयकता नहीं है, जो इस विषय से पूर्णतया परिचित हों, और इस समस्या का निजी अनुभव रखते हों?केवल यह कह देना की दूसरा कोई इस काम को कर लेगा या इस कार्य को करने के लिए बहुत लोग हैं, किसी प्रकार भी उचित नहीं कहा जा सकता.इस प्रकार जो लोग क्रांतिकारी क्षेत्र में कार्यों का भार दूसरे लोगों पर छोड़ने को अप्रतिष्ठापूर्ण एवं घृणित समझते हैं, उन्हें पूरी लगन के साथ वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर देना चाहिए.उन्हें चाहिए की वे उन विधियों का उल्लंघन करें,परन्तु उन्हें औचित्य का ध्यान रखना चाहिए.क्यूंकि अनावश्यक एवं अनुचित पयत्न कभी भी न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता.इस प्रकार का आंदोलन क्रान्ति के कार्यकाल को बहुत सीमा तक कम कर देगा.जितने आंदोलन अब तक आरम्भ हुए हैं, उन सबसे पृथक रहने के लिए आपको जो तर्क दिए हैं, मैं उन्हें समझने में असमर्थ हूँ.कुछ मित्र ऐसे हैं, जो या तो मुर्ख हैं या नासमझ.वे आपके इस व्यवहार को(जिसे वे स्वयं कहते हैं की हम किंचित भी नहीं समझ सकते,क्यूंकि आप उनसे बहुत ऊँचे और उनकी समझ से बहुत परे हैं) अनोखा और अदभुत समझते हैं.

आप लिखते हैं की चौदह वर्ष तक बन्दीगृह के कष्टों से भरपूर जीवन बिताने के पश्चात किसी व्यक्ति से यह आशा नहीं की जा सकती की उस समय भी उसके विचार वही होंगे, जो जेल जाने से पूर्व थे, क्यूंकि जेल का वातावरण उसके समस्त विचारों को रौंदकर कुचल देगा.क्या मैं आपसे पूछ सकता हूँ की क्या जेल से बाहर का वातावरण हमारे विचारों के अनुकूल था?फिर भी असफलताओं के कारण क्या हम उसे छोड़ सकते थे?क्या आपका आशय यह है की यदि हम इस क्षेत्र में न उतरे होते तो कोई भी क्रन्तिकारी कार्य कदापि नहीं हुआ होता?यदि ऐसा है तो आप भूल कर रहे हैं.यधपि यह ठीक है की हम भी वातावरण को बदलने में बड़ी सीमा तक सहायक सिद्ध हुए हैं, तथापि हम तो केवल अपने समय की आवश्कता की उपज हैं.

जेल के नियमों के अनुसार जीवन की निराशाओं दबाव और हिंसा के असीम परिक्षयुक्त वातावरण का विरोध करते हुए हम कार्य करते रहे.जिस समय हम अपना कार्य करते थे,उस समय नाना प्रकार से हमें कठिनाइयों का निशाना बनाया जाता था.यहाँ तक की जो लोग अपने आपको महँ क्रांतिकारी कहने का गौरव अनुभव करते थे, वे भी हमको छोड़ गए,क्या ये परिस्थितियां असीम परिक्षयुक्त नहीं थी?फिर अपने आंदोलन एवं प्रयासों को जारी रखने के लिए हमारे पास क्या कारण और तर्क था?

क्या स्वयं यही तर्क हमारे विचारों को शक्ति नहीं देता है?और क्या ऐसे क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के उदाहरण हमारे सामने नहीं हैं, जो जेलों से दंड भोग कर लौटे और अब भी कार्य कर रहे हैं?यदि बाकुनिन ने आपके समान सोच विचार किया होता, तो वह प्रारंभ में ही आत्महत्या कर लेता.आज आपको असंख्य ऐसे क्रन्तिकारी दिखाई देते हैं,जो रुसी राज्य में उत्तरदायी पदों पर विराजमान हैं और जिन्होंने अपने जीवन का अधिकतर भाग दंड भोगते हुए जेलों में बिताया है.मनुष्य को अपने विश्वासों पर दृढ़तापूर्वक अडिग रहने का प्रयत्न करना चाहिए.कोई नहीं कह सकता की भविष्य में क्या घटना होने वाली है.

एक और विशेष बात, जिस पर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ, यह है की हम लोग इश्वर,पुनर्जनम,नरक-स्वर्ग,दण्ड एवं पारितोषिक, अर्थात भगवन द्वारा किये जाने वाले जीवन के हिसाब किताब आदि में कोई विश्वास नहीं रखते.अतः हमें जीवन एवं मृत्यु के विषय में भी नितांत भौतिकवादी रीति से सोचना चाहिए.एक दिन जब मुझे पहचाने जाने के लिए दिल्ली से यहाँ लाया गया था, तो गुप्तचर विभाग के कुछ अधिकारीयों ने मेरे पिताजी की उपस्थिति में मुझसे इस विषय पर बातचीत की थी.उन्होंने कहा था की मैं कोई भेद खोलने और इस प्रकार अपना जीवन बचाने के लिए तैयार नहीं हूँ, इससे यह सिद्ध होता है की मैं जीवन से बहुत दुखी हूँ.उनका तर्क था की मेरी यह मृत्यु तो आत्महत्या के समान होगी, परन्तु मैंने उनको उत्तर दिया था की मेरे जैसे विश्वास और विचारों वाला व्यक्ति व्यर्थ में ही मारना कदापि सहन नहीं कर सकता.हम तो अपने जीवन का अधिक से अधिक मूल्य प्राप्त करना चाहते हैं.विशेषकर मेरे जैसा भला मनुष्य,जिसका जीवन किसी भी रूप में दुखी या चिंतित नहीं है, किसी समय भी, आत्महत्या करना तो दूर, उसका विचार भी ह्रदय में लाना ठीक नहीं समझता.वही बात मैं इस समय आपसे कहना चाहता हूँ.

क्रान्ति तो केवल सतत कार्य करते रहने से,प्रयत्नों से,कष्ट सहन करने से एवं बलिदानों से ही उत्पन्न की जा सकती है, और की जायेगी.जहाँ तक मेरे दृष्टिकोण का सम्बन्ध है, मैं तो केवल उसी दशा में सबके लिए सुविधाओं और क्षमादान का स्वागत कर सकता हूँ, जब उसका प्रभाव स्थायी हो और देश के लोगों के हृदयों पर हमारी फांसियों के कुछ अमिट चिन्ह अंकित हो जाएँ.बस यही, इससे अधिक कुछ नहीं.




भगत सिंह के बाकी पत्र  
कष्टों से भागना कायरता है-सुखदेव के नाम एक और पत्र  
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